संवाद न्यूज एजेंसी
पौड़ी।
लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी ने गढ़वाली बोली के प्रचार-प्रसार और संरक्षण पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि अपनी बोली-भाषा को सहेजकर अगली पीढ़ी तक पहुंचाना नई पीढ़ी की जिम्मेदारी है। बोली व भाषा भी समय के साथ बदलती है और समय-समय पर उसमें बदलाव जरूरी होता है। इस मौके पर गढ़वाली गद्य गैंणा बिज्यां छन और कलश संस्था की स्मारिका का विमोचन हुआ।
घुड़दौड़ी स्थित एक होटल में आयोजित गढ़वाली भाषा मानकीकरण कार्यशाला में बतौर मुख्य अतिथि पहुंचे नरेंद्र सिंह नेगी ने कहा कि लोकभाषा की आवश्यकताओं के अनुरूप निरंतर बदलती रहती है। गढ़वाली भी हिंदी की तरह ही परिवर्तनशील भाषा है। उत्तराखंड राज्य बनने के बाद गढ़वाली भाषा और साहित्य पर अच्छा कार्य हुआ है।
विशिष्ट अतिथि गिरीश सुंदरियाल ने कहा कि गढ़वाली पर संस्कृत और हिंदी का व्यापक प्रभाव है। साहित्य के विकास के लिए भाषा का मानकीकरण जरूरी है। एचएनबी गढ़वाल विवि की हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. गुड्डी बिष्ट ने कहा कि विवि में हिंदी के साथ गढ़वाली बोली भाषा पर भी कार्य किया जा रहा है। कवि देवेंद्र जोशी ने कहा कि गढ़वाली का साहित्य समृद्ध है। कार्यशाला में जगदंबा प्रसाद कोटनाला, साहित्यकार मदन डुकलान, गणेश खुगशाल गणी ने भी विचार रखे।
इस मौके पर कवि ओमप्रकाश सेमवाल, साहित्यकार बीना बेंजवाल, रमाकांत बेंजवाल, बलवीर राणा अडिग, डॉ. वीरेंद्र बर्त्वाल, गजेंद्र नौटियाल, अनिल बिष्ट आदि मौजूद रहे।