देवप्रयाग। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने देवप्रयाग में भागीरथी नदी में बिना ट्रीटमेंट किया हुआ सीवेज और सेप्टेज बहाए जाने के आरोपों पर कड़ा रुख अपनाया है। मामले की गंभीरता को देखते हुए एनजीटी ने देवप्रयाग नगर पालिका को निर्देश दिया है कि वह इस पूरे प्रकरण पर अपनी विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करे। एनजीटी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान माना कि याचिका में पर्यावरण नियमों के पालन से जुड़ा एक अत्यंत महत्वपूर्ण सवाल उठाया गया है। अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 16 अक्तूबर की तिथि तय की है।
यह याचिका बद्रीनाथ धाम की तीर्थ पुरोहित प्रियंका कर्नाटक की ओर से दाखिल की गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि सार्वजनिक शौचालयों और आसपास की नालियों से निकलने वाला गंदा पानी सीधे देवप्रयाग संगम के पास भागीरथी नदी में बहाया जा रहा है। इसी संगम स्थल पर भागीरथी और अलकनंदा मिलकर गंगा नदी का रूप लेती हैं। याचिकाकर्ता ने जन-सुविधा केंद्रों का उल्लेख करते हुए बताया कि तीर्थयात्रियों के उपयोग वाले शौचालयों का सीवेज बिना किसी ट्रीटमेंट के सीधे नदी में डाला जा रहा है। अपने इन दावों की पुष्टि के लिए अदालत के समक्ष तस्वीरें भी साक्ष्य के तौर पर पेश की गई हैं।
मामले में पर्यावरण सुरक्षा के मानकों की अनदेखी को देखते हुए ट्रिब्यूनल ने चार प्रमुख पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। एनजीटी ने टिहरी गढ़वाल के जिलाधिकारी, उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव, राज्य पर्यावरण सचिव और देवप्रयाग नगर पालिका परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी को मामले में पक्षकार बनाते हुए अगली सुनवाई से पहले अपना रुख स्पष्ट करने का निर्देश दिया है।