कमलेश्वर महादेव मंदिर में आयोजित घृत कमल अनुष्ठान के मौके पर शिव लिंग मे घी का लेपन करते मंहत आशु?
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कमलेश्वर महादेव मंदिर में सोमवार रात घृत कमल पूजा और दिगंबर लोट परिक्रमा अनुष्ठान का आयोजन किया गया। इस मौके पर भगवान शिव को नाना प्रकार के व्यंजनों का भोग लगाया गया। पूजा-अर्चना के बाद शिवलिंग में लेपित घी को भक्तों में वितरित किया गया।
सोमवार रात करीब आठ बजे से भगवान शिव की पूजा-अर्चना शुरू हुई। लगभग डेढ़ घंटे चली पूजा के पश्चात शिवलिंग पर महंत आशुतोष पुरी ने घी का लेपन किया। इसके पश्चात शिवलिंग को कंबल से ढका गया। तत्पश्चात महंत की पत्नी के हाथों से बने व्यंजनों का भोग भगवान शिव को लगाया गया। इसके बाद आरती हुई। रात लगभग 11 बजे महंत ने दिगंबर अवस्था में शरीर पर भष्म लगाकर मंदिरों के चारों ओर लोट परिक्रमा की। परिक्रमा के पश्चात भंडारे का आयोजन किया गया। तड़के कंबल हटाकर घी का प्रसाद वितरित किया गया। अनुष्ठान में आचार्य आनंद प्रकाश नौटियाल, दुर्गा प्रसाद बमराड़ा, गोवर्धन गिरी, प्रदीप पुरी, कृष्ण भट्ट, प्रदीप फोंदणी, विमल कपरूवान,अमन उनियाल, दिगंबर भट्ट, मोहित, शिवम, जगदीश नैथानी, संतोष, प्रेमानंद मैठाणी, व प्रकाश चंद्र खंकरियाल आदि ने सहयोग किया।
यह है मान्यता
देवताओं ने घृत कमल पूजा भगवान शिव को हिमालय पुत्री माता पार्वती से दूसरा विवाह करने हेतु की थी। तारकासुर दैत्य ने भगवान ब्रह्मा से वरदान प्राप्त किया था कि उसकी मृत्यु शिव के पुत्र के हाथों ही होगी। तारकासुर जानता था कि भगवान शिव माता सती (राजा दक्ष की पुत्री) की मृत्यु के बाद दूसरा विवाह नहीं करेंगेे और साधना में लीन हो गए हैं। ऐसे में उनके पुत्र के जन्म की कोई संभावना नहीं है। अमर रहने के घमंड में डूबे तारकासुर ने अपने अत्याचारों से पूरे ब्रह्मांड में हाहाकार मचा दिया। उसने समस्त संसार मेें अपना आधिपत्य जमा लिया। तारकासुर के अत्याचार से पीड़ित सभी देवता भगवती का आह्वान करते हैं, जिस पर भगवती हिमालय पुत्री उमा (नंदा) के रूप में जन्म लेती है। लेकिन शिवजी ध्यान अवस्था में लीन थे। कामदेव उनकी साधना भंग कर देते हैं। तत्पश्चात सभी देवता शिव को विवाह के लिए मनाते हैं।