गढ़वाल विवि के चौरास परिसर में विश्व रंगमंच दिवस के मौके पर पिंजर नाटक का मंचन करते कलाकार
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गढ़वाल विश्वविद्यालय के लोककला संस्कृति एवं निष्पादन केंद्र व शैलनट नाट्य संस्था की संयुक्त पहल पर ‘पिंजर’ नाटक का मंचन किया गया। अमृता प्रीतम के प्रसिद्ध उपन्यास पर आधारित यह नाटक एकता और प्रेम का संदेश देने में सफल रहा। इस मौके पर रंगमंच के क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए वरिष्ठ रंगकर्मी मदनलाल डंगवाल को भी सम्मानित किया गया।
विश्व रंगमंच दिवस के अवसर पर कला संस्कृति एवं निष्पादन केंद्र के सभागार में प्रसिद्ध पिंजर नाटक का मंचन हुआ। नाटक का शुभारंभ प्रो. दिनेश सकलानी, प्रो. मोनिका गुप्ता, पूर्व मुख्य वन संरक्षक प्रवीण थपलियाल व डा. वंदना थपलियाल ने किया। विभाजन के दर्द को बया करते इस मंचन के कुछ दृश्यों ने दर्शकों की आंखें नम कर दीं। नाटक में दिखाया गया कि भारत-पाकिस्तान के विभाजन के समय हिन्दू -मुस्लिमों के रिश्तों में तल्खी आ गई। जगह-जगह दंगे हो रहे हैं। दोनों ही पक्ष एक-दूसरे के खून के प्यासे हैं। चारों ओर मारकाट, अपहरण जैसी खबरें सुनाई दे रही हैं। इस माहौल के बीच पूरो के घर पर उसकी शादी की रस्में शुरू हो चुकी हैं, लेकिन शादी से दो दिन पहले रशीद नाम का युवक पुरानी खानदानी रंजिश और अपने परिवार के दबाव के चलते पूरो का अपहरण कर लेता है। रशीद का निकाह पूरो के साथ करवा दिया जाता है, लेकिन छह महीने बीत जाने पर भी पूरो उसे स्वीकार नहीं करती। रशीद तमाम कोशिशों और अच्छाइयों के बाद भी उसके दिल में जगह नहीं बना पाता। इस बीच पूरो को पता लगता है कि उसकी भाभी को भी दंगाइयों ने अगुवा कर लिया है। वह रशीद की मदद से अपनी भाभी को ढूंढकर अपने परिवार से मिलवा देती है। पूरो का भाई और परिवार उसे घर आकर नए सिरे से जिंदगी शुरू करने को कहते हैं, लेकिन अब पूरो को रशीद की नेकदिली का एहसास हो जाता है और वह अपने परिवार का आग्रह ठुकराकर रशीद के साथ ही जिंदगी बिताने का निर्णय लेती है। पटकथा लेखक व निर्देशक शशांक जमलोकी ने रशीद का किरदार निभाया। पूरो के रूप में काजल मेहरा, लाजो की भूमिका में मुस्कान, रज्जो की भूमिका में आस्था, चाची की भूमिका में अंकिता व रामचंद्र की भूमिका में उमंग खुगशाल रहे। अंकुर पांडेय, रॉबिन असवाल व रोहित ने खलनायक के पात्र निभाए