संक्रामक रोग के निदान के लिए ली जाने वाली एंटीबायोटिक्स का अधिक सेवन जहां खतरनाक माना जाता है, वहीं इसका डोज अधूरे में छोड़ना भी घातक है। अधूरी दवाइयों के सेवन से मनुष्य के शरीर में बैक्टीरिया (जीवाणु) एंटीबायोटिक रजिस्टेंस (प्रतिरोधी) हो जाते हैं। इससे भविष्य में रोगी का संबंधित एंटीबायोटिक्स से उपचार नहीं हो सकता है।
सबसे खतरनाक पहलू यह है कि एंटीबायोटिक प्रतिरोधी जीवाणु एक से दूसरे मनुष्य में संक्रमित हो जाते हैं। चिकित्सा क्षेत्र में इसे चेतावनी के तौर पर माना जा रहा है। राजकीय मेडिकल कालेज इस पर वृहद अध्ययन कर रहा है। देखा जा रहा है कि अभी किसका कितना प्रभाव है, ताकि कालेज/अस्पताल में एंटीबायोटिक पॉलिसी बनाई जा सके। इससे सारे चिकित्सक उसके मुताबिक एंटीबायोटिक दे सकेंगे।
लगभग 70 सालों से संक्रामक रोगों के निदान के लिए एंटीबायोटिक्स का प्रयोग किया जा रहा है। एंटीबायोटिक्स ने रोगों और मौत का ग्राफ कम किया है। हालांकि इसके प्रयोग में जागरूकता की कमी ने नई समस्या खड़ी कर दी है।
मेडिकल कालेज के माइक्रोबायलोजी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर डा. शेखर पाल कहते हैं कि सामान्यत: मरीज को चिकित्सक तीन, पांच या सात दिन तक एंटीबायोटिक प्रयोग करने की सलाह देते हैं, लेकिन मरीज दो दिन बाद स्वस्थ महसूस करने पर एंटीबायोटिक का सेवन बंद कर देता है। बची हुई दवाइयों को भविष्य में तबियत खराब होने की दशा में काम आएंगी, यह सोचकर संभाल देता है। कई बार पूरी डोज लेने के बाद भी मरीज ठीक नहीं होता तो वह सीधे मेडिकल स्टोर से एंटीबायोटिक खरीद लेता है। यह तीनों स्थिति खतरनाक हैं। तीनों ही दशा में मरीज के शरीर में एंटीबायोटिक प्रतिरोधी जीवाणु हो जाते हैं। ऐसे में फिर एंटीबायोटिक बदलनी पड़ती है।
उन्होंने बताया कि वर्तमान में उनका विभाग फिलहाल यह अध्ययन कर रहा है कि कितने रोगी प्राइमरी बैक्टीरिया से संक्रमित हैं और कितने प्रतिरोधी बैक्टीरिया से।
समय और मात्रा महत्वपूर्ण
श्रीनगर। रोग के निदान में डोज एंड ड्यूरेशन (मात्रा और समय) की महत्वपूर्ण भूमिका है। यदि सही समय पर सही मात्रा नहीं ली, तो एंटीबायोटिक प्रतिरोधी जीवाणु फैलने की आंशका रहती है।