थलीसैंण के रणगांव के बाद अब पट्टी ढाईज्यूली की ईड़ा गांव की महाकाली का न्याजा (ध्वजा) भी गांव की बेटियों से मिलने उनकी ससुराल की ओर चल पड़ा है। बूढ़ा भरसार (बूढ़ा केदार) में न्याजा के पहुंचने पर भव्य मेला आयोजित किया गया। चार पट्टियों के गांवों ने यहां वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ पूजा अर्चना के बाद देवताल से आशीर्वाद लिया।
देवभूमि उत्तराखंड के ठेठ राठ क्षेत्र के गांवों में देव पूजा की विशिष्ट परंपरा है। न्याजा एक ऐसी परंपरा है, जो गांवों को अटूट आध्यात्मिक व सांस्कृतिक बंधन में बांधे रखती है। ईड़ा गांव के ईष्ट घंडियाल देवता न्याजा के अगुवा देवता हैं। राठ क्षेत्र के दो प्रसिद्ध मंदिर विंदेश्वर व बूढ़ा भरसार 8वीं शताब्दी के मंदिर हैं और इस पूरे क्षेत्र में परंपराएं इन्हीं मंदिरों से आरंभ होती है। बुधवार को बूढ़ा भरसार में न्याजा के पहुंचते ही मेला उमड़ पड़ा। कपरोली गांव के 105 वर्षीय बदरी सिंह बताते हैं कि पहले मेला बूढ़ा भरसार से ही आरंभ होता था, लेकिन मंदिर दूर होने की वजह से अब गांवों में ही मेला आयोजित होता है। न्याजा अब तक कपरोली, चोपड़ा कोट और ईड़ा बगेली आदि गांवों का भ्रमण कर चुका है। 25 दिसंबर तक भ्रमण के बाद यज्ञ अनुष्ठान के साथ न्याजा यात्रा पूरी होगी। 38 वर्ष बाद होने जा रहे न्याजा मेले में आए शंभू प्रसाद रतूड़ी, रामचंद्र रतूड़ी, केशर सिंह आदि ग्रामीणों ने बताया कि न्याजा सुख समृद्धि का प्रतीक है।