पौड़ी। उत्तराखंड की लोक संस्कृति की 60 वर्षों तक साधना करने वाले प्रसिद्ध ढोल वादक भुर्या दास का निधन हो गया है। वह 85 वर्ष के थे। जागर, मंडाण, अठ्वाण में उनकी स्तुतियों से देवता अवतरित होते थे। उन्होंने जनपद पौड़ी, चमोली व अल्मोड़ा के सैकड़ों गांवों में संस्कृति साधना की।
थलीसैंण ब्लाक में चौथान पट्टी स्थित डडोली गांव में वर्ष 1933 को भुर्या दास का जन्म हुआ। बालपन से ही देव स्तुतियों के प्रति उनका रुझान देख माता-पिता ने उन्हें इसी विधा में पारंगत होने दिया। भुर्या ने जागर, अठ्वाण, मंडाण व मेलों में ढोल की थाप पर स्तुतियां गाकर लोगों के मन पर छाप छोड़ी। उनकी ख्याति चौथान पट्टी से जनपद चमोली के लोबा पट्टी व अल्मोड़ा जनपद के चकोट क्षेत्र में भी फैली थी। उन्हें ढोल-दमाऊं के साथ ही डौंर-थाली में भी महारत हासिल थी। वीर चंद्र सिंह गढ़वाली चौथान विकास समिति के मीडिया प्रभारी चंदन सिंह गुसाईं ने बताया कि भुर्या दास ने हमारी समृद्ध संस्कृति के अहम हिस्सों जागर, मंडाण, अठ्वाण में अतुलनीय योगदान दिया है। जिसके लिए सरकार को उन्हें सम्मानित करना चाहिए।