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थम चुकी हैं गढ़वाल के 726 गांवों की धड़कन

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पौड़ी। राज्य गठन के 17 वर्षों में भी पर्वतीय जिकी तस्वीर नहीं बदली है। तमाम घोषणाओं और योजनाओं के बावजूद पलायन का सिलसिला थमने को नहीं है। रोजगार के साथ ही बिजली, पानी, सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं होने से गांव आबादी विहीन होते गए हैं। कई गांवों में खेती और जान के दुश्मन बने जंगली जानवर लोगों को घर-गांव छोड़ने को मजबूर कर रहे हैं। अर्थ एवं संख्या विभाग के आंकड़ों पर नजर डालें तो मंडल के सात जिलों में 726 गांव आबादी विहीन श्रेणी में आ चुके हैं। पौड़ी जिले में सर्वाधिक 440 गांव खाली हो चुके हैं। उत्तरकाशी जिले में सबसे कम पलायन हुआ है। यहां मात्र पांच गांव ही आबादी विहीन हैं। अन्य जिलों में चमोली में 78, टिहरी 42, देहरादून 21, रुद्रप्रयाग 33 और हरिद्वार में 117 गांव आबादी विहीन हो चुके हैं।
पौड़ी जिला सबसे ज्यादा पलायन की मार झेल रहा है। पौड़ी शहर से करीब 40 किमी दूर ब्लाक कोट के बौंडुल गांव में दो बुजुर्ग महिलाएं विमला देवी (67) और पुष्पा देवी (66) रहती हैं। पहले कभी यहां 16 परिवार रहते थे। इस गांव में जंगली जानवरों की जबरदस्त दहशत है। सूरज छुपते ही गांव में सुअर और गुलदार का बेहद खतरा होता है। ऐसे में दोनों बुजुर्ग महिलाएं शाम होते ही घर के दरवाजे-खिड़की बंद कर घर में दुबक जाती हैं। ब्लाक कल्जीखाल के बलूनी गांव में रिटायर्ड सैनिक श्याम प्रसाद अकेले रहते थे, वे भी इसी साल गांव छोड़ कर चले गए। इसी ब्लाक के चौंडली गांव की भी यही स्थिति है। इस गांव में कभी 25 परिवार रहते थे। सभी यहां से पलायन कर चुके हैं। सबसे अंत में 79 वर्ष के प्रेम सिंह वर्ष 2016 में गांव छोड़कर चले गए।
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हिमालय पुत्र हेमवती नंदन बहुगुणा का गांव बुधाणी भी पलायन से अछूत नहीं है। इस गांव में कभी 65 परिवार थे, आज सिर्फ 22 परिवार ही रह गए हैं। स्व. बहुगुणा का पैतृक भवन भी जर्जर होकर बिखर रहा था लेकिन संग्रहालय में तब्दील होने के बाद यह टूटने से बच गया। गांव की रिद्धेश्वरी देवी बताती हैं कि जब तक हेमवती नंदन बहुगुणा जीवित थे, तब वे हर साल गांव आकर लोगों को भोज देते थे। तब पलायन कम था लेकिन अब पलायन से गांव खाली है। संग्रहालय बनेगा तो उम्मीद है कि गांव से गए लोग लौटेंगे।
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कोट
पौड़ी और अल्मोड़ा में पलायन सबसे अधिक है। टिहरी और चमोली में भी जनसंख्या घट रही है। आयोग बढ़ते पलायन को लेकर गंभीर है। इन क्षेत्रों में विशेष योजनाएं तैयार की जाएंगी ताकि पलायन पर लगाम लगाई जा सके। आजीविका, सड़क, पेयजल, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव पलायन की बड़ी वजह है। जंगली जानवरों का भय भी एक कारण है।
-डा. शरद नेगी, उपाध्यक्ष, ग्राम्य विकास एवं पलायन आयोग।
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