हरिद्वार में शिक्षकों ने सरकारी स्कूलों में एक से आठवीं तक परीक्षा न कराने की विभाग की सोच को खारिज किया है। उनका मानना है कि यह गरीब बच्चों का बेड़ा गर्क करने वाली सोच है। लिखित परीक्षा न कराने से बच्चे पढ़ने लिखने से किनारा करेंगे।
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विद्यार्थी यह भूल जाएंगे की लिखित परीक्षा क्या होती है। शिक्षक नेताओं का कहना है कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई) 2009 लागू करके पहले ही बच्चों से फेल होने का डर हटा दिया गया। रही सही कसर अब पूरी हो जाएगी।
सरकारी स्कूलों में गरीबों के बच्चे पढ़ते हैं इसका मतलब यह कतई नहीं कि इन स्कूलों को प्रयोगशाला बना दिया जाए। शिक्षक नेताओं का कहना है इस योजना का विरोध किया जाएगा। आंदोलन करने से भी पीछे नहीं हटेंगे।
प्राथमिक और जूनियर कक्षाओं की परीक्षा नहीं कराया जाना विभागीय सोच का घटियापन है। इसकी जितनी निंदा की जाए कम है, शिक्षक इस मामले में चुप नहीं बैंठेंगे।
- राजेश सैनी, माध्यमिक शिक्षक संघ
विभाग इस सोच के जरिए बच्चों को नकारा बनाना चाहता है। बिना परीक्षा स्कूलों का अस्तित्व क्या रह जाएगा। पहले क्या कसर रह गई थी जो अब यह नया सिगूफा छोड़ा जा रहा है।
- सुखबीर सिंह चौहान, जिला मंत्री, जूनियर शिक्षक संघ
विभाग पूरी तरह शिक्षा का स्तर बरबाद करने पर तुला हुआ है। नीतियां इस तरह सोच समझकर बनाई जा रही हैं कि गरीब का बच्चा पढ़ाई न कर सके। यह नीति गरीबों को गरीब बनाए रखने की साजिश का हिस्सा है।
- हरेंद्र कुमार, प्रांतीय सरंक्षक राजकीय माध्यमिक शिक्षक संघ
एक से आठ कक्षा तक परीक्षा न कराना एक गलत निर्णय है। इससे बच्चों की नींव कमजेार होगी। देश में शिक्षा का भविष्य खतरे में पड़ जाएगा।
- अशोक कुमार चौहान, जिलाध्यक्ष प्राथमिक शिक्षक संघ
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