इस समय उत्तराखंड के पहाड़ प्रचंड गर्मी के कारण धधक रहे हैं, लेकिन बेड़ू के पेड़ को गर्मी के थपेड़े कोई असर नहीं डाल रहे हैं। बेड़ू का पेड़ सालभर हरा रहता है और उसमें सालभर फल आते हैं तथा पकते रहते हैं।
शायद इसीलिए 1952 में प्रख्यात लोक कलाकार मोहन उप्रेती और बीएस साह ने-बेड़ू पाको बारमासा... गीत की रचना कर दी और विख्यात लोक गायक गोपाल बाबू गोस्वामी ने इस बेहतरीन गीत को स्वर दिया था। तब यह गीत जीआईसी नैनीताल में मंचित किया गया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू भी इस गीत से बेहद प्रभावित हुए।
लोग कहते हैं पहाड़ी अंजीर
बेड़ू का वानस्पतिक नाम फाइकस केनयाटा है। पहाड़ों पर 700 से लेकर 1800 मीटर की ऊंचाई पर मिलने वाले बेड़ू के पेड़ों में हर समय छोटे-छोटे दाने लगे होते हैं। इसे पहाड़ी अंजीर कहा जाए तो गलत नहीं होगा।
अच्छी तरह पकने पर इसका स्वाद मीठा हो जाता है। पक्षियों और जंगली जानवरों को यह काफी पसंद आता है। बेड़ू के पेड़ में लगने वाली पत्तियां सालभर हरी रहती हैं। गर्मियों में लोग इसकी पत्तियों को जानवरों के चारे के लिए उपयोग करते हैं।
बेड़ू स्थानीय जलवायु और तापमान के हिसाब से कभी भी पक जाता है। घाटी वाले इलाकों में तो मानसून सीजन में बेड़ू खूब पकता है। यह बात अलग है कि पहाड़ में अब बेड़ू के पेड़ कम होते जा रहे हैं।