दस साल का पीयूष देखने में सामान्य बच्चों की तरह है। अस्पताल भी आता है तो खूब मस्ती करता है। इतनी बार सुशीला तिवारी अस्पताल आ चुका है कि यहां के कोने-कोने से वाकिफ है।
15 मिनट में पूरे अस्पताल का चक्कर लगाकर वापस गेट पर आ जाता है। उसकी हंसी देखकर लगता ही नहीं कि वह नौ साल से कैंसर से लड़ रहा है।
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उसे खुद भी पता नहीं उसे कितनी घातक बीमारी है। कैंसर का पता तो उसके पिता मोहन लाल की डबडबाई आंखों से बयां होता है।
उम्र के पांच साल अस्पतालों में ही काटे
पीयूष इतना खुशमिजाज है कि उसे देखकर नहीं कह सकते कि उसने अपनी उम्र के पांच साल तो अस्पतालों में ही काट दिए होंगे।
बेटे की कैंसर की बीमारी को यदि मोहन लाल की जिंदगी से हटा दिया जाए तो उसके खुशहाल परिवार में पीयूष के अलावा दो बेटियां हैं। सरकारी नौकरी है, लेकिन पिछले नौ साल में पीयूष के इलाज पर सब खर्च हो चुका है।
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कंधे में ट्यूमर
तीन-तीन लोन लिए, गाड़ियां और जमीन बेची यहां तक कि सारा फंड भी उसके इलाज पर फूंक दिया। अब तक 14 लाख रुपये इलाज में खर्च हो चुके हैं।
पीयूस उस वक्त डेढ़ साल का था जब मोहन लाल को पता चला कि उसके बेटे के कंधे में ट्यूमर है। ट्यूमर धीरे-धीरे छाती की तरफ खिसक रहा था और खतरनाक हो रहा था। दस साल की उम्र में उसके तीन ऑपरेशन हो चुके हैं।
तीन साल एम्स में काट चुका
इलाज के लिए महीने में 15 दिन उसे अस्पताल में रहना होता है। तीन साल वह एम्स में काट चुका है। इसके बावजूद उसके लिए सब सामान्य है। वह अस्पताल में नहीं होता तो स्कूल में होता है।
सीरा पब्लिक स्कूल डीडीहाट में चौथी कक्षा में पढ़ता है। असामान्य हालात तो पिता मोहन लाल के लिए हैं जो बेटे को मौत के मुंह से खींचकर लाया है और अकेले पिथौरागढ़ से लेकर दिल्ली तक के अस्पताल छान मारे हैं।
बढ़े हैं ठीक होने के चांस
पीयूष का इलाज कर रहे डा. केसी पांडे का बयान मोहन और उसके बेटे में जान फूंकने वाला है। डा. पांडे कहते हैं कि पीयूष धीरे-धीरे ठीक हो रहा है। रेडियोथेरेपी का उस पर असर हुआ है और ठीक होने के चांस भी बहुत बढ़ गए हैं।