हल्द्वानी। 13वीं नेशनल ओपन ताइक्वांडो चैंपियनशिप में उत्तराखंड के खिलाड़ियों ने शानदार प्रदर्शन करते हुए कई पदक जीते। उत्तर प्रदेश दूसरे स्थान पर रहा।
शुक्रवार को गौलापार के अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम में शुरू हुई तीन दिवसीय प्रतियोगिता का शुभारंभ एसएसपी मंजूनाथ टीसी ने किया। पहले दिन फ्रेशर केटेगरी में सब जूनियर, जूनियर और कैडेट वर्ग के मुकाबले हुए। कैडेट जी-20 के बालक वर्ग में उत्तर प्रदेश के शिवम त्यागी ने स्वर्ण, उत्तराखंड के आर्यन कुमार ने रजत और नीरज परिहार ने कांस्य पदक हासिल किया। जी-21 में उत्तराखंड के अयान सिंह नेगी ने स्वर्ण, अंश बुटोला ने रजत और विक्रांत गौतम व प्रियांशु जोशी ने कांस्य पदक जीते। जी-5 में उत्तराखंड के ही कुणाल कुमार, ओजस प्रणय ने रजत, और करन कबडल व शिवम राना ने कांस्य पदक अपने नाम किए।
उत्तराखंड ताइक्वांडो एसोसिएशन के सचिव कमलेश तिवारी ने बताया कि प्रतियोगिता में सेंसर तकनीक से मुकाबले कराए जा रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय रेफरी पंजाब के शिवप्रकाश शुक्ला पर्यवेक्षक और महाराष्ट्र के सुभाष पाटिल निदेशक के रूप में आए हैं। विभिन्न राज्यों के 35 निर्णायक भी है। वहां उत्तर प्रदेश एसोसिएशन के सचिव राजकुमार, शेखर त्रिपाठी, अनिल कार्की, शशिकांत शर्मा, कौशल किशोर सिंह, विक्रम भंडारी, दरवान सिंह परिहार आदि मौजूद रहे।
हौसले के बल पर बाधाओं को किया पार
हल्द्वानी। गौलापार स्टेडियम में आयोजित 13वीं राष्ट्रीय ओपन ताइक्वांडो चैंपियनशिप में कई खिलाड़ियों ने अपनी चुनौतियों को पार कर जगह बनाई है। इन युवाओं ने आर्थिक और शारीरिक बाधाओं के बावजूद अपने सपनों को जिंदा रखा।
राजस्थान की 16 वर्षीय जयश्री कुमावत को अस्थमा था। इसके बावजूद उन्होंने आठ साल पहले ताइक्वांडो खेल को चुना। आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने से पिता कन्हैया लाल उनके खेलने के पक्ष में नहीं थे लेकिन उनकी मां मंजू कुमावत ने बेटी को सपनों को पंख लगाए। जयश्री ने अब तक आठ राष्ट्रीय और 10 ओपन नेशनल में कई पदक जीत चुकी हैं।
रेलिंग लगाने का काम करने वाले पिता प्रह्लाद कुमावत की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण राजस्थान की युक्तिका कुमावत कई प्रतियोगिताएं छोड़नी पड़ीं। राजस्थान के कृष्णा गुर्जर ने 10 साल पहले ताइक्वांडो खेलना शुरू किया था। 2017 में पिता की मृत्यु के बाद परिवार पर आर्थिक संकट आ गया। छोटे भाई, दिव्यांग बहन और मां की जिम्मेदारी को सहारा देने के लिए उन्होंने स्कूल में कोच की नौकरी की।