हल्द्वानी। नई शिक्षा नीति में छात्र-छात्राओं को उत्तराखंड के इतिहास के बारे में और अधिक जानने का मौका मिलेगा। इसमें उत्तराखंड के इतिहास का एक अलग चैप्टर होगा। गढ़वाली और कुमाऊंनी विषयों में भी अलग से पढ़ाई होगी। इससे मातृ भाषा का विकास होगा और नई पीढ़ी के बच्चों को अपने प्रदेश की संस्कृति और भाषा के बारे में ज्यादा जानने का मौका मिलेगा। देश के कई राज्यों में क्षेत्रीय भाषा को स्कूलों के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है, लेकिन प्रदेश में अब तक ऐसा नहीं हो पाया है। इसका प्रभाव नई पीढ़ी के बच्चों पर पड़ रहा है। वह अपनी संस्कृति और मूल भाषा से दूर होते जा रहे हैं।
गढ़वाल और कुमाऊं के लोग लंबे समय से पाठ्यक्रम में कुमाऊंनी और गढ़वाली भाषा को शामिल करने की मांग कर रहे हैं। इसके लिए पूर्व में प्रयास भी किए गए, लेकिन मसला आगे नहीं बढ़ पाया। मौजूदा सरकार ने इस मामले को एक बार फिर उठाया है। नई शिक्षा नीति के तहत पाठ्यक्रम में उत्तराखंड के इतिहास का एक अलग चैप्टर और कुमाऊंनी, गढ़वाली भाषा को शामिल किया जाएगा। इसका लाभ आने वाली पीढ़ी को मिलेगा, उन्हें घर के साथ ही स्कूल से भी अपनी संस्कृृति और भाषा को जानने का मौका मिलेगा।
शिक्षा व उच्च शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत ने विगत दिनों हल्द्वानी में शिक्षा विभाग की एक बैठक के दौरान इस मुद्दे को उठाया था। उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति में स्कूलों के पाठ्यक्रम में उत्तराखंड के इतिहास का एक अलग चैप्टर होगा। इससे नई पीढ़ी के बच्चों को अपनी संस्कृति को जानने का मौका मिलेेगा। साथ ही पाठ्यक्रम में कुमाऊंनी और गढ़वाली भाषा को भी शामिल किया जाएगा। ताकि बच्चे अपनी क्षेत्रीय भाषा और संस्कृति से अछूते न रहे।