उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने प्लास्टिक से निर्मित कचरे का निस्तारण सही तरीके से नहीं किए जाने के मामले में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद डायरेक्टर पंचायतीराज व डायरेक्टर अर्बन डवलपमेंट को शपथ पत्र दाखिल करने के साथ ही यह बताने को कहा है कि पूर्व में दिए गए निर्देशों के क्रम में सिंगल यूज प्लास्टिक व प्लास्टिक मैनेजमेंट के मामले में उनके द्वारा क्या उपाय किए गए है।
कोर्ट ने चीफ सेक्रेटरी से कहा है कि प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट और कूड़ा निस्तारण के लिए एक जागरूकता अभियान चलाने पर विचार किया जाए। जिसमें स्कूली बच्चों, गणमान्य नागरिकों न्यायिक प्रकिया से जुड़े लोग सहित अन्य जागरूक लोगों को इसमें शामिल किया जाए। कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई के लिए छह सप्ताह बाद की तिथि नियत की है। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की तरफ से कोर्ट को अवगत कराया गया कि प्लास्टिक निर्मित कचरे के निस्तारण के लिए अधिक धनराशि खर्च कर उपकरण खरीदे गए, उसके बावजूद अभी भी कई ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में कचरे के ढेर लगे हुए है। जो भी कूड़ेदान बनाए गए उनका उपयोग नहीं हो पर रहा है।
मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता एवं न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार अल्मोड़ा हवलबाग निवासी जितेंद्र यादव ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा था कि राज्य सरकार ने 2013 में बने प्लास्टिक यूज व उसके निस्तारण करने के लिए नियमावली बनाई गई थी। लेकिन इन नियमों का पालन नही किया जा रहा है। 2018 में केंद्र सरकार ने प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स बनाए गए थे जिसमें उत्पादकर्ता, परिवहनकर्ता व विक्रेताओ को जिम्मेदारी दी थी कि वे जितना प्लास्टिक निर्मित माल बेचेंगे उतना ही खाली प्लास्टिक को वापस ले जाएंगे। अगर नही ले जाते है तो संबंधित नगर निगम, नगर पालिका व अन्य को फंड देंगे जिससे कि वे इसका निस्तारण कर सकें। लेकिन उत्तराखंड में इसका उल्लंघन किया जा रहा है।
पर्वतीय क्षेत्रों में प्लास्टिक के ढेर लगे हुए है और इसका निस्तारण भी नही किया जा रहा है। इसका पता तब चलता है जब वर्षात मे जल भराव हो जाता है और नालिया चौक हो जाती है। सीजन समाप्त होने के बाद कूड़ा ही कूड़ा दिखाई देता है।