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Haldwani: हर मांग मानने से ब्लैकमेलिंग का हो जाएगा बच्चे का स्वभाव, विशेषज्ञ बोले- पारिवारिक माहौल दें परिजन

Tue, 25 Mar 2025 11:09 AM IST
हल्द्वानी ब्यूरो अमर उजाला नेटवर्क, हल्द्वानी

सार

गुस्सैल बच्चे कई बार आपे से बाहर हो जाते हैं और मनमर्जी करने लगते हैं। कई बार उनके स्वभाव से अभिभावक परिवार और समाज को असहज स्थिति का सामना करना पड़ता है।
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सांकेतिक तस्वीर।
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विस्तार
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जिद्दी और गुस्सैल बच्चे कई बार आपे से बाहर हो जाते हैं और मनमर्जी करने लगते हैं। कई बार उनके स्वभाव से अभिभावक परिवार और समाज को असहज स्थिति का सामना करना पड़ता है। मनोवैज्ञानिक और बाल रोग विभाग विशेषज्ञों से जानते हैं कि इस तरह के बच्चों से कैसे पेश आएं...।

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विशेषज्ञ डॉक्टरों के अनुसार खासकर 12 से 15 साल की उम्र के बच्चों को समझाना बेहद कठिन होता है। वे इस उम्र में शारीरिक परिवर्तन के दौर से गुजरते हैं। ऐसी स्थिति में अभिभावकों की ही जिम्मेदारी सबसे अहम होती है। सोशल मीडिया के दौर में अगर बच्चे के साथ संवाद नहीं होगा तो वह परिवार से कटे-कटे रहेंगे। अभिभावक बच्चे के गुस्से के दौरान साथ क्रिया की प्रतिक्रिया न करें बल्कि उन्हें इमोशनली कंट्रोल करें।

ऐसा माहौल बनाएं कि बच्चा खुद मान की बात कहे
परिवार में तनाव, बच्चों से बात न करना, एक ही बच्चा है तो एडजस्टमेंट की कमी का होना आदि समस्याएं सामने आती हैं। इससे बच्चों की मनोवृति पर विपरीत असर पड़ता है। अभिभावकों का छोटी छोटी बातों पर बच्चों पर चिल्लाना और आपे से बाहर होना यह गलत है। बच्चों की दोस्ती किससे है, यह देखने की जरूरत है। परिवार में ऐसा माहौल बनाएं कि बच्चा आपसे स्वयं अपनी समस्या या कोई बात शेयर कर सके। कम से कम खाना खाते समय सब साथ में बैठें। उनकी हर डिमांड पूरी न करें वरना बच्चे का स्वभाव आगे चलकर ब्लैकमेलिंग वाला बन जाएगा। अभिभावक बच्चे को उसकी लिमिट बताएं, अपना व्यवहार अच्छा रखें। स्कूल में उसका व्यवहार कैसा है या वहां से कोई परेशानी तो नहीं है यह देखने की जरूरत है।  -डॉ. ऋतु रखोलिया, विभागाध्यक्ष बाल रोग विभाग, एसटीएच
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अभिभावक समझें और बच्चों को समय दें
सबसे पहले अभिभावकों को कम्युनिकेशन गैप दूर कर बच्चे की मनोवृत्ति को समझना होगा। हार्मोनल चेंज होने से युवावस्था की सोच अलग होती है। वे समझते हैं कि वह जो कर रहे हैं वही सही है। ऐसी स्थिति में उन्हें डांटे नहीं, उनकी आलोचना न करें बल्कि उन्हें समझें। इस उम्र से अभिभावक भी गुजर चुके हैं, हालांकि यह समय अलग है। अगर बच्चा मोबाइल मांगता है तो उससे कहें पहले आप पढ़ाई करें उसके बाद आपको फोन मिलेगा। समझें कि बच्चे का व्यवहार, विचार क्यों बदल रहे हैं। हालांकि बच्चों को अनुशासन में लाना अभिभावकों की ही जिम्मेदारी है लेकिन तरीका बदलना पड़ेगा। बच्चा गुस्सा है तो उसके शांत होने पर बात करें। उसकी सोशल मीडिया की आदत को लिमिट में रखें। अभिभावक बच्चों को कंट्रोल करना चाहते हैं जबकि उन्हें स्वतंत्र रूप से सोचने को कहें। -डॉ. निकिता देउपा, साइकेट्रिस्ट

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