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सड़क बनाने के लिए सपानी की महिलाओं ने उठाए फावड़े

Sat, 01 Apr 2017 01:54 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, भीमताल (नैनीताल)।
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सड़क बनाने के लिए - फोटो : अमर उजाला
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भीमताल (नैनीताल)। यदि इरादे नेक और मजबूत हों तो कोई भी काम असंभव नहीं है। इसे कर दिखाया है रामगढ़ ब्लाक के ग्रामसभा दाड़िम के तोक सपानी और इसके आसपास की महिलाओं ने। ग्रामीणों की बार-बार मांग के बाद भी न तो सरकार ने तोक तक सड़क पहुंचाई और न ही जनप्रतिनिधियों ने ग्रामीणों की कोई तवज्जो दी।
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सड़क के अभाव में समय-समय पर होने वाले हादसों और हाल ही में अस्पताल ले जाते वक्त महिला के गर्भपात की घटना ने गांव की महिलाओं को झकझोर दिया। इन घटनाओं से सबक लेते हुए महिलाओं ने खुद श्रमदान कर सड़क बनाने का निर्णय लिया और चार दिन में डेढ़ किलोमीटर सड़क तैयार की।

 दाड़िमा गांव में स्थित जूनियर हाईस्कूल से तोक सपानी की दूरी लगभग तीन किलोमीटर है। तोक तक पहुंचने के लिए लगभग 16 साल पहले जिला पंचायत ने संपर्क मार्ग बनाया था लेकिन इस संपर्क मार्ग की हालत ऐसी नहीं थी कि इसमें दुपहिया या फिर चौपहिया वाहन चल सकें। ऐसे में तोक में रहने वाले 30 परिवारों को आपात स्थिति में मरीजों अथवा गर्भवती महिलाओं को पैदल ही रोड हेड तक पहुंचाना पड़ता था। कई बार तो गंभीर मरीज रोड हेड तक पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देते थे।
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बताया जाता है कि कुछ दिन पहले प्रसव पीड़ा से छटपटा रही एक महिला को जब अस्पताल ले जाने के लिए रोड हेड तक लाया जा रहा था तो संपर्क मार्ग के बेहद उबड़-खाबड़ होने के कारण रास्ते में ही उसका गर्भपात हो गया।

इस घटना से सबब लेते हुए तोक की महिलाओं ने तय किया कि वह स्वयं उक्त संपर्क मार्ग की हालत सुधारने के लिए श्रमदान करेंगी और संपर्क मार्ग को चौपहिया वाहन के चलने लायक बनाएंगी।

तयशुदा कार्यक्रम के तहत महिलाओं ने स्वयं गेंटी, फावड़ा और तसले लेकर पहली नवरात्र से श्रमदान किया और आज चार दिन में ही लगभग डेढ़ किलोमीटर संपर्क मार्ग को चौपहिया वाहनों के चलने लायक बना दिया। महिलाओं के जज्बे को देख गांव के युवा भी श्रमदान को आगे आए हैं। हर रोज महिलाएं घरेलू काम निपटाने के बाद श्रमदान में जुटती हैं। 

 60 वर्षीय सावित्री देवी बताती हैं कि बीते पांच साल में तोक में 5 लोगों की मौत केवल इसलिए हो गई क्योंकि उन्हें सड़क के अभाव में समय पर अस्पताल नहीं पहुंचाया जा सका। सुशीला देवी कहती हैं कि सरकार सुरक्षित प्रसव का नारा देती है लेकिन यहां गांव की महिलाओं को टीकाकरण के लिए भी तीन किलोमीटर पैदल जाना होता है।

सामाजिक कार्यकर्ता जीतेंद्र रैक्वाल बताते हैं कि तोक में तीन लोग शत प्रतिशत दिव्यांग हैं। उन्हें भी जब कभी कहीं लाना ले जाना होता है तो सड़क के अभाव में परिजनों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।

श्रमदान में जुटी महिलाओं को उम्मीद है कि अगले कुछ दिनों में वह पूरी सड़क को इस तरह से तैयार कर लेंगी कि इसमें जरूरत पड़ने पर चौपहिया वाहन को चलाया जा सके। लेकिन रास्ते में आने वाले मोड़ और कई जगह हुए भूस्खलन को हटाने के लिए महिलाओं को जेसीबी की जरूरत है।

उन्हें उम्मीद है कि उनकी पहल को देखते हुए जिला प्रशासन अथवा क्षेत्र के जनप्रतिनिधि उनके इस कार्य में मदद को आगे आएंगे। श्रमदान करने वाली महिलाओं में दुर्गा रैक्वाल, बीना रैक्वाल, कमलेश देवी, लता, गंगा थापा, दीपा नैनवाल, खष्टी देवी, सुशीला देवी, सीमा नेगी और सावित्री देवी आदि मुख्य रूप से शामिल हैं। 
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