उत्तराखंड सरकार और खेल निदेशालय बिना जमीनी हकीकत परखे ही राष्ट्रीय खेल कराने का दावा कर रहा था, जिसका ढोल एक झटके में ही गोवा के हामी भरते ही फूट गया। ऐसा नहीं भारतीय ओलंपिक संघ ने उत्तराखंड को मौका नहीं दिया। भले ही यह मौखिक रूप से दिया गया, लेकिन इसे भुनाने की कोशिश प्रदेश सरकार की ओर से नहीं की गई।
अगर समय से पहले सारी तैयारियों को पूरा करके उसकी प्रस्तुति बेहतर तरीके से भारतीय ओलंपिक संघ के समक्ष की जाती तो निश्चित ही उत्तराखंड में 2018 में खेल होते।
गौलापार में 192 करोड़ की लागत से बन रहे अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम का काम जुलाई में पूरा होना था। लेकिन खेल विभाग की लापरवाही और निर्माण एजेंसी की लेटलतीफी के कारण अभी तक सिर्फ क्रिकेट स्टेडियम ही बन पाया है। अभी स्वींमिग पूल, इंडोर स्टेडियम, बास्केटबॉल कोर्ट, बॉक्सिंग रिंग का काम अब तक अधूरा है।
यहीं बन रहे फुटबॉल ग्राउंड को अभी तक जमीन ही आवंटित नहीं हो पाई है। फुटबाल को छोड़कर अभी इंडोर स्टेडियम पूरा होने पर चार महीने और लग सकतेे हैं। में बुनियादी सुविधाएं तो दूर कोच की नियुक्ति तक नहीं हो पाई है।
न ही अंतराष्ट्रीय स्टेडियम बनकर तैयार हुआ है। ऐसे में उत्तराखंड के हाथ से राष्ट्रीय खेल जाने ही थे। फर्ज कर लिया कि 2018 में ही उत्तराखंड में राष्ट्रीय खेल होते तो क्या होता वह भी उस स्थिति में जब खिलाड़ियों को प्रशिक्षित करने के लिए प्रशिक्षकों तक भर्ती अब तक नहीं हो पाई है।
ऐसे में तय था कि उत्तराखंड के खिलाड़ी अन्य राज्यों के मुकाबले मेडल जीतने के लिए जूझते ही नजर आते, नतीजतन पदक तालिका में उत्तराखंड का नाम खोजना ही पड़ता।
हल्द्वानी मिनी स्टेडियम का काम भी अधूरा
राष्ट्रीय खेलों के कुछ मैच हल्द्वानी मिनी स्टेडियम में भी होने हैं लेकिन इसका काम भी समय सीमा समाप्त होने के तीन माह बाद भी कछुआ रफ्तार से ही चल रहा है। यहां अब तक 80 प्रतिशत काम ही पूरा हो पाया है जबकि इसे जून में पूरा हो जाना था। यह स्टेडियम 14.35 करोड़ रुपये से बनना था।
इस स्टेडियम में बैडमिंटन के चार कोर्ट, टेबल टेनिस के चार कोट, जिम, स्कॉश के तीन कोर्ट, एक हजार सीट का पवेलियन और छात्रावास बनना था। इसमें से छात्रावास, स्कॉश और जिम बनकर तैयार है। बाकि में काम चल रहा है।
अक्टूबर माह होने वाले खेल महाकुंभ कहां होंगे
खेल निदेशालय अक्टूबर माह में खेल महाकुंभ मनाने जा रहा है। ऐसे में इस महाकुंभ पर ही प्रश्नचिह्न उठने लग गए हैं। आखिर बिना बुनियादी सुविधाएं और कोचों के महाकुंभ कहां और कैसे होंगे। इस महाकुंभ से हमारे खिलाड़ियों को क्या फायदा मिलेगा।