नैनीताल। दून घाटी के साथ ही कोटाबाग का इलाका ऐसा है जहां भूकंप आने पर अधिक नुकसान हो सकता है। हमें परंपरागत तकनीक पर आधारित भवन निर्माण पर जोर देने की आवश्यकता है। भूकंप रोधी भवनों का निर्माण जरूरी है। कुमाऊं विश्वविद्यालय के भू-विज्ञान विभाग और जियोलॉजिकल सोसायटी ऑफ इंडिया बेंगलुरु के संयुक्त आयोजन में चल रहे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के निदेशक प्रो. विनीत कुमार गहलोत ने यह बात कही। सम्मेलन में विशेषज्ञों ने हिमालय की जटिल भू-गतिकीय संरचना, जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और आपदा प्रबंधन से जुड़ी समसामयिक चुनौतियों पर गहन वैज्ञानिक विमर्श को प्रोत्साहित करने पर चर्चा की।
हरमिटेज भवन स्थित देवदार सभागार में हिमालय की भू-गतिकीय उत्क्रांति: क्रिस्टल संरचना, जलवायु, संसाधन एवं आपदा विषय पर हुए सम्मेलन में प्रो. गहलोत ने कहा कि भूकंप की संवेदनशीलता का पता लगाने के लिए उपकरणों की कमी नहीं है। पद्मश्री प्रो. हर्ष गुप्ता कहते हैं कि भूकंप दिवस मनाने व स्कूलों में बच्चों को भूकंप से बचाव की जानकारी देनी होगी। यदि स्कूली बच्चे जागरूक हो गए तो अभिभावक भी भूकंपरोधी मकान बनाने के लिए प्रेरित होंगे। भू-विज्ञान विभाग के प्रो. संतोष कुमार ने हिमालयी क्षेत्र एक अत्यधिक सक्रिय भूकंपीय क्षेत्र है। यहां टेक्टोनिक प्लेटों के टकराव के कारण बड़ी ऊर्जा जमा होती है जिससे विनाशकारी भूकंप आते हैं। वर्ष 1900 से 2010 के दौरान भूकंप काफी तेजी से आए हैं। खासकर वर्ष 2000 के बाद भूकंप अधिक दर्ज हुए हैं। प्रो. राजीव उपाध्याय ने कहा हिमालयी क्षेत्र की नाजुक पर्यावरण स्थिति और बढ़ती आपदाओं को देखते हुए एक समन्वित और समग्र दृष्टिकोण आवश्यक है। इस मौके पर प्रो. चित्रा पांडे, प्रो. ललित तिवारी, प्रो. अनीता पांडे, डॉ. रीना, अभिषेक मेहरा, डॉ. अशोक आदि मौजूद रहे। संवाद