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Nainital News: आर्यन के काम आ गया बागी हैं पर दागी नहीं का नारा

Wed, 30 Sep 2026 01:54 AM IST
हल्द्वानी ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, नैनीताल
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हल्द्वानी।
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कुमाऊं के सबसे अधिक छात्रसंख्या वाले एमबीपीजी महाविद्यालय के छात्रसंघ चुनाव में इस बार बड़ा उलटफेर हुआ है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को अध्यक्ष पद पर धीरज बिष्ट पर दांव लगाना भारी पड़ गया। यहां परिषद में बगावत कर मैदान में उतरे निर्दलीय प्रत्याशी आर्यन बेलवाल का डंका बज गया। एबीवीपी प्रत्याशी को दूसरा स्थान भी नहीं मिल पाया।
अध्यक्ष पद पर चुनाव जीते आर्यन बेलवाल लंबे समय से एबीवीपी से जुड़े रहे हैं। इस बार भी उन्होंने परिषद के बैनर तले ही अध्यक्ष पद के लिए चुनाव प्रचार शुरू किया था। आर्यन को उम्मीद थी कि संगठन उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि और उनकी खुद की मेहनत को देखते हुए उन्हें ही प्रत्याशी घोषित करेगा लेकिन ऐन वक्त पर संगठन ने धीरज बिष्ट को अध्यक्ष पद का प्रत्याशी घोषित किया तो आर्यन ने बगावत करते हुए निर्दलीय चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया। धीरज को भाजपा से लेकर एबीवीपी तक के कई बड़े नेताओं का समर्थन मिला था। इसी बीच बगावत कर मैदान में उतरे आर्यन ने नारा दिया बागी हैं पर दागी नहीं। उनका यह नारा काम कर गया और उन्होंने एनएसयूआई के मेहुल साह को हराकर अध्यक्ष की कुर्सी जीत ली।
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आर्यन की जीत के ये रहे प्रमुख कारण
1.एबीवीपी की अंदरूनी बगावत का सहानुभूति वोट :-
आर्यन खुद परिषद के पुराने कार्यकर्ता रहे हैं। टिकट न मिलने पर उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा तो परिषद का बड़ा धड़ा उनके साथ चला गया। छात्र इसे बगावत नहीं बल्कि हक की लड़ाई मान रहे हैं।
2. वादे पूरे नहीं हुए...
एमबीपीजी महाविद्यालय में पिछले कई वर्षों से अध्यक्ष पद पर एबीवीपी ही चुनाव जीतती रही है, लेकिन चुनाव जीतने के बावजूद छात्र-छात्राओं की प्रमुख समस्याएं लाइब्रेरी, प्लेसमेंट, हॉस्टल आदि के वादे पूरे नहीं हुए। इससे छात्रों में एंटी इनकंबेंसी थी जो बागी के रूप में निकली।
3. मुद्दों पर कैंपेन, पार्टी से दूरी :-
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और एनएसयूआई के प्रत्याशियों ने संगठन के बूते चुनाव लड़ा। उन्हें उम्मीद थी कि संगठन का लाभ उन्हें मिलेगा जबकि आर्यन ने सीधे छात्र-छात्राओं की समस्याओं को मुद्दा बनाया और फेस टू फेस उनसे कनेक्ट किया।
4. जूते-चप्पल त्यागे... बीती 18 सितंबर को दिल्ली विवि छात्रसंघ के
चुनाव में मुद्दों को लेकर जूते-चप्पल त्यागने वाले प्रत्याशियों ने जीत दर्ज की। इसी तर्ज पर आर्यन ने भी घोषणा की कि जब तक हॉस्टल नहीं बनेगा, वह नंगे पैर ही रहेंगे। इसके जरिये भी छात्रहितों के लिए उनकी गंभीरता का संदेश गया।
नहीं मिला परिषद में फूट का फायदा
एनएसयूआई के मेहुल साह को उम्मीद थी कि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में हुई फूट के बाद उसका वोट बैंक बंटेगा और इसका सीधा फायदा उन्हें मिलेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। एबीवीपी से जो वोट कटे वह आर्यन के खाते में गए। इसके अलावा आर्यन ने नए मतदाताओं को खासा प्रभावित किया। मेहुल साह एबीवीपी के वोट नहीं तोड़ पाए।
क्यों पिछड़े एबीवीपी के धीरज बिष्ट
- बागी ने काटा आधा वोट:-
एबीवीपी का पारंपरिक वोट धीरज को मिलने के बजाय बागी आर्यन के खाते में चला गया। आर्यन को सहानुभूति वोट भी खूब मिला। पिछले चुनाव में एबीवीपी के अभिषेक गोस्वामी 1738 वोटों से जीते थे।
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-अति आत्मविश्वास :- सत्तारूढ़ पार्टी के छात्र संगठन से जुड़ा होने और कई प्रभावशाली लोगों का संरक्षण होने के कारण एबीवीपी प्रत्याशी के समर्थकों में अति आत्मविश्वास की स्थिति भी थी।
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