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नदियों की सेहत ठीक नहीं, सीधे पीने योग्य नहीं पानी

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हल्द्वानी। कुमाऊं में कई नदियों की सेहत पूरी तरह ठीक नहीं है। पहाड़ से लेकर भाबर तक नदियों, झीलों का पानी सीधे पीने योग्य नहीं है। पीसीबी रिपोर्ट में इसकी पुष्टि हुई है।
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उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने कुमाऊं मंडल में विभिन्न जगहों से नदियों और झीलों के पानी के सैंपल लिए थे। ये सैंपल जनवरी से अप्रैल के मध्य लिए गए। इनकी रिपोर्ट चिंताजनक है। नैनीताल जिले की बात करें तो नैनीताल झील, सातताल, नौकुचियाताल झील, भीमताल झील का पानी वॉटर क्वालिटी क्राइटेरिया बी श्रेणी (ए से ई तक अलग-अलग श्रेणी होती है, जो पानी की गुणवत्ता को दर्शाती है) में आया है। बी श्रेणी का पानी नहाने योग्य होता है। यही नहीं, पीसीबी ने नैनीताल जिले में गौला नदी से लेकर रानीखेत-खैरना पुल के पास कोसी नदी के पानी तक का सैंपल लिया। इस स्थानों पर भी पानी की क्वालिटी का क्राइटेरिया बी श्रेणी में आया है।
कई मानक बेहतर भी
हल्द्वानी। अगर पहाड़ और भाबर की नदियों और झीलों की बात करें तो कई मानक बेहतर भी मिले हैं। पानी में बायो केमिकल ऑक्सीजन डिमांड, केमिकल ऑक्सीजन डिमांड और डिजाल्व ऑक्सीजन को भी देखा जाता है। इस मानक पर नदियों और झीलों का पानी बेहतर स्थिति में मिला है। यह एक अच्छा संकेत भी है। विशेषज्ञों के मुताबिक टोटल कोलीफॅार्म, फीकल कोलीफॉर्म के ज्यादा होने के कारण झीलों और नदियों का पानी ए श्रेणी में नहीं आया है। अगर यहां पर सुधार किया जाए तो स्थिति और बेहतर हो सकती है।
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तराई की नदियों का हाल भी ठीक नहीं
तराई में बहने वाली नदियों का हाल भी बेहतर नहीं है। कल्याणी नदी का पंतनगर औद्योगिक क्षेत्र से सैंपल लिया गया, जो डी श्रेणी में आया है। बहल्ला नदी का लोहिया बैराज के पास से लिए गए सैंपल की जांच में गुणवत्ता का मानक और नीचे मिला। इसके पानी की श्रेणी ई में पहुंच गई।
दूषित पानी से पेटजनित बीमारियों का खतरा
हल्द्वानी। मेडिकल कॉलेज हल्द्वानी के प्राचार्य डॉ. अरुण जोशी कहते हैं दूषित पानी से पेटजनित बीमारियों का खतरा रहता है। इसमें पीलिया, टायफाइड, वायरल हेपेटाइटिस, पेट में कीड़े से लेकर आंतों संबंधी दिक्कत हो सकती है।
क्या कहते हैं पर्यावरणविद
हल्द्वानी। पर्यावरणविद डॉ. अजय रावत कहते हैं कि पर्वतीय क्षेत्रों में दस सालों में निर्माण कार्य जल स्रोतों के पास हुआ है जबकि दो सौ मीटर तक निर्माण नहीं हो सकता। इनके भवनों से निकला सीवेज जलस्रोत में जाता है। इससे नदी का पानी दूषित होता है। सड़क निर्माण के दौरान निकला मलबा और भवन निर्माण के दौरान मलबे को इन्हीं जल स्रोत में डाला जाता है। इससे जल की गुणवत्ता खराब हो रही है। तराई में इंडस्ट्रीयल एरिया आदि जगह से निकला दूषित पानी भी समस्या की वजह है। इन सब पर नजर रखने वालीं संस्थाएं पंगु बनी हुई हैं। अगर इन गतिविधियों को नियंत्रित किया जाए तो नदियों के पानी की गुणवत्ता में सुधार हो सकता है।
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