हल्द्वानी। जनता की सुविधा के लिए सरकारी महकमों में वाहनों की व्यवस्था की गई। अलग-अलग सुविधाओं के मकसद से इन वाहनों का उपयोग किया जाना था। हालांकि मानव संसाधन की कमी के चलते अधिकतर वाहनों का इस्तेमाल ही नहीं हो पाया। एक जगह ऐसी भी है जहां वाहन का इस्तेमाल तो हो रहा है लेकिन जिस उद्देश्य से उसे लाया गया था उसकी जगह वाहन से अन्य तरह का काम लिया जा रहा है। संवाद
एचएम का कोर्स बंद तो वाहन हुआ खड़ा
उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय में इंडियन नॉलेज कार्पोरेशन की ओर से शिक्षा जन-जन के द्वार के तहत वाहन मंगाया गया था। इसका उद्देश्य होटल मैनेजमेंट विषय का प्रचार प्रसार करना था। इसमें रसोई जैसी सुविधा भी है लेकिन यहां एचएम का कोर्स बंद होने के बाद से यह वाहन परिसर में खड़े खड़े खराब हो गया है।
कुलसचिव प्रो. पीडी पंत ने बताया कि जब यहां एचएम का कोर्स था तब इस वाहन का इस्तेमाल होता था। फिलहाल यह वाहन बाहर पार्किंग की तरफ खड़ा है और करीब बेकार स्थिति में पहुंच गया है।
एनिमल एंबुलेंस से गायों को ढो रहे
वर्ष 2020 में तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने निराश्रित दुर्घटना ग्रस्त पशुओं की सहायता के लिए आपातकालीन वाहन का उद्घाटन किया था। पशु चिकित्सालय को यह वाहन जिला योजना के तहत मिला था। हालांकि इसके लिए एक पशु डॉक्टर, फार्मेसिस्ट, सहायक और चालक का होना जरूरी है। बजट के अभाव में अस्पताल इतना मानव संसाधन जुटा ही नहीं पाया। इस वजह से इस वाहन से अब गाय को ले जाने का काम किया जाता है।
अस्पताल के पशु चिकित्साधिकारी डॉ. आरके पाठक ने बताया कि गाय को ले जाने के लिए वाहन को डीजल की व्यवस्था भी अपने स्तर पर ही करनी पड़ती है।
रेडियोलोजिस्ट नहीं होने से वाहन वापस
हंस फाउंडेशन ने एसटीएच में मैमोग्राफी कराने के लिए एक वाहन दिया था। इसके तहत कैंपों का आयोजन किया जाना था। मुख्य उद्देश्य यह था कि पर्वतीय क्षेत्रों के दुर्गम इलाकों में जाकर लोगों को स्वास्थ्य सुविधाएं दी जाएं। हालांकि एसटीएच में रेडियोलोजिस्ट नहीं होने की वजह से इस वाहन को वापस करना पड़ गया। अगर अस्पताल में रेडियोलोजिस्ट होता तो दुर्गम क्षेत्रों के लोगों को काफी सुविधाएं मिल सकती थीं।
शिविर ही नहीं लगा पाया एसटीएच
एसटीएच में ही ब्लड बैंक में रक्त की उपलब्धता के लिए रक्त शिविर लगाए जाने को लेकर एक वाहन आया था। इसमें रक्त को सुरक्षित रखने के लिए रेफ्रिजरेटर की भी व्यवस्था थी। अस्पताल से जानकारी मिली कि इस वाहन के रखरखाव की लागत काफी ज्यादा था, जिसको वहन कर पाना अस्पताल के बस की बात नहीं थी। इस वजह से इस वाहन को करीब ढाई साल पहले वापस कर दिया गया।
जेसीबी से रास्ता नहीं हो पाया साफ
वर्ष 2007 में भूतल एवं परिवहन मंत्रालय ने परिवहन विभाग को एक जेसीबी दी थी। इससे की यदि कहीं रास्ते में कोई रुकावट आई हो तो उसे हटाकर रास्ता साफ कर दिया जाए। यह वाहन भी मानव संसाधन की कमी की वजह से वापस कर दिया गया है।