दुर्गम क्षेत्र बाना प्राइमरी स्कूल की अध्यापिका रितु वर्मा सरकारी स्कूलों के टीचरों के लिए आइना हैं। रितु ने बाना स्कूल में एक बच्चे को पढ़ाने के लिए अपने दो बच्चों की ममता छोड़ दी। रितु की जीवटता से स्कूल में अब बच्चों की संख्या बढ़कर छह पहुंच गई। रितु बाना गांव की बेटी बन चुकी है। छह बच्चों को पढ़ाने के साथ खुद ही स्कूल का रंग रोगन करती हैं।
भीमताल बीआरसी का बाना अंतिम छोर के प्राइमरी स्कूलों में शामिल है। शिक्षा के विभाग के कागजों में स्कूल मौना में दर्ज है। मौना से बाना डेढ़ किमी दुर्गम इलाके में है। स्कूल दशकों पुराना है। 2013 में स्कूल का अपना भवन बना है। इससे पहले स्कूल बाना चर्च परिसर में चलता आया है। बाना ईसाई समुदाय का गांव है। गांव की मौजूदा जनसंख्या करीब 200 से अधिक है। गांव में दो लोगों को छोड़कर हर कोई पढ़ालिखा है।
बावजूद इसके गांव का एकमात्र प्राइमरी स्कूल हमेशा बच्चों से खाली रहा है। इसकी वजह प्राइमरी स्कूल में किसी भी टीचर के नहीं टिकने और गांव के बच्चों का हल्द्वानी और नैनीताल के मिशनरी स्कूलों में दाखिल रहा है। 14 अगस्त 2013 को बाना प्राइमरी स्कूल में भवाली की रितु की तैनाती हुई। रितु की अपनी नौकरी के कार्यकाल की यह दूसरी पोस्टिंग थी। तब स्कूल में मात्र एक छात्र था।
रितु के लिए भवाली से हल्द्वानी होकर बाना स्कूल पहुंचना बेहद लंबा और तीन किमी के बीहड़ जंगल का पैदल सफर था। बरसात के दिनों में कई जगह नाले उफनाने और जंगली जानवरों का खतरा अलग से। शुरुआत में वो अपने पति के साथ स्कूल आने एवं जाने लगी। पति नैनीताल कोर्ट में अधिवक्ता हैं। कुछ वक्त बाद रितु से स्कूल में एक बच्चे को पढ़ाने के लिए अपने दो बच्चों की ममता छोड़ दी। रितु ने गांव में ही रहने के लिए कमरा ले लिया।
वह हफ्ते में एक दिन अपने घर भवाली जाने लगी। रितु को 14 अगस्त को स्कूल में तीन साल पूरे हो जाएंगे। रितु की जीवटता देख कुछ ग्रामीणों ने अपने बच्चों को मिशनरी स्कूल हल्द्वानी या नैनीताल भेजने के बजाए प्राइमरी में दाखिला शुरू कर दिया। स्कूल में बच्चों की संख्या छह पहुंच गई है। इनमें अंकिता, ऐंजल, ऑल्विन, दीपक फ्रांसिस, शीतु और अंश शामिल हैं। सभी बच्चे अलग-अलग कक्षाओं में हैं, लेकिन पढ़ते सभी साथ हैं।