निर्भीक, साहसी ठाकुर दत्त जोशी का सामना बचपन से ही आदमखोर जानवरों से रहा। सन 1936 को हल्द्वानी में जन्मे ठाकुर दत्त जोशी के सिर से बचपन में ही माता-पिता का साया उठ गया था। वर्ष 2010 में ‘कुमाऊं के खौफनाक आदमखोर’ नाम से उनकी किताब छपी।
इस किताब के मुताबिक गर्मियों की छुट्टियों के समय ठाकुर अपने घर के जानवर को चराने के लिए जंगल जाते थे। ठाकुर की बैलों की जोड़ी थी। इनके नाम टिकुवा-गोविंदा थे। इन पर उनका विशेष ध्यान रहता था क्योंकि ये वही बैलों की जोड़ी थी, जिससे गांव में जुताई, मंडाई आदि खेती के काम कराने होते थे।
ठाकुर को शायद इस बात का कभी अहसास नहीं हुआ कि जिन जानवरों को चराने के लिए वह जंगल में ले जा रहे हैं वह इतने प्रेरक बनेंगे। बेहद साहसी ठाकुर जब जानवर चराने के लिए जंगल जाते थे तो वह इस बात से बेफिक्र रहते थे कि जंगल में उनके साथ क्या होगा। जंगल में निहत्थे ठाकुर का पहली बार तेंदुए से सामना हुआ।
इस घटना में उनके बैलों के जोडे़ पर अचानक तेंदुआ झपटा तो उन्होंने पत्थर मार कर तेंदुए से अपने बैल बचा लिए। इस घटना के बाद जोशी ने कई आदमखोरों के आतंक से स्थानीय जनता को निजात दिलाई। रिकॉर्ड के मुताबिक जोशी ने 71 आदमखोर बाघ, तेंदुओं को मारा था। वन विभाग में वन्यजंतु रक्षक के पद पर कार्यरत रहे जोशी ने जनता को आजीवन आदमखोर जानवरों से निजात दिलाई।
बोर की रायफल हमेशा साथ रखी
ठाकुर दत्त जोशी अपनी 315 बोर की रायफल हमेशा साथ रखते थे, वन विभाग में कार्यरत रहने, सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने कई आदमखोर बाघ, तेंदुओं के आतंक से ग्रामीणों को निजात दिलाई, जिनमें मोहान की मवेशी भक्षक बाघिन, कुकरैल (लखनऊ) का नरभक्षी बाघ, चौफुला का आदमखोर बाघ, मौलेखाल, रातीघाट, चंपावत, पिथौरागढ़, खांखरा (अलकनंदा) के आदमखोर से राहत दिलाई।