हल्द्वानी। अभिव्यक्ति कार्यशाला की ओर से आयोजित तीन दिवसीय लोक उत्सव आवाहन 2019 का रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ समापन हो गया है। सांस्कृतिक संध्या में लोक गायकों ने एक से बढ़कर एक कुमाऊंनी और गढ़वाली गीत पेश कर श्रोताओं को झूमने पर मजबूर कर दिया।
पर्वतीय सांस्कृतिक उत्थान मंच में गणपति वंदना से लोक उत्सव कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। ओरम स्कूल के 50 बच्चों ने ‘नर सिंह बाजो, तुतुरी बाजी, नगाड़ बाजो बाजो, बाजि रै मुरुली हुड़ुका घमाघम’ पर लोक नृत्य पेश किया। नूपुर कलाकेंद्र के कलाकारों ने ‘रामायण’ पर नृत्य नाटिका पेश की। पर्वतीय कला संगम दिल्ली के कलाकारों ने भगवत मनराल के निर्देशन में ‘हम उत्तराखंडी छूं’ गीत पेश किया। नैब के 30 बच्चों ने ‘जमीं मेरी मेरा आसमां, रंग नहीं कोई, संग नहीं सपने मेरे साथ’ सामूहिक गीत पेश किया।
दिल्ली के पहाड़ी सोल बैंड की धुन पर लोक गायक अमित गोस्वामी ने ‘कैले बजै मुरूली ओ बैंणा ऊंचा नीचा डांड्यूं मां’, लोक गायिका दीपा नगरकोटी ने ‘एक न्यौली और ओहो रंगीलो कुमाऊं मेरो, रंगीलो गढ़वाल’, मनोज चड्ढा और दीपा नगरकोटी ने ‘ओ भीना कैसिकै जानूं द्वारहाटा’, रोहन भारद्वाज और करिश्मा ने ‘नई नई ब्या छू, धीरे धीरे हिट वे’, मनोज चड्ढा ने ‘झन दिया बौज्यू छाना बिलौरी, लागला बिलौरी का घामा’, खुशी जोशी ने ‘स्वर्ग तारा जुनैली रात, को सुंणलो तेरी मेरी बात’ कुमाऊंनी गीत पेश किए।
इससे पूर्व सांसद अजय भट्ट ने कुमाऊंनी में भाषण दिया और उन्होेंने कहा कि संस्कृति संरक्षण की दिशा में किया जा रहा यह प्रयास सराहनीय है। कार्यक्रम में मौजूद सांसद अजय भट्ट, पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल, भाजपा जिलाध्यक्ष प्रदीप बिष्ट आदि ने रमाकांत पंत की पुस्तक मां भद्रकाली का विमोचन किया। कार्यक्रम में चारु तिवारी, मनोज चंदोला, प्रकाश भट्ट, रंगकर्मी बल्ली सिंह चीमा, भावना पंत, डीके पंत, आशिमा पांडे, खुशाल चंदोला, हिमाद्रि, हंसा अमोला, गोविंद पंत, संजय सिजवाली, योगेश पंत, तुषार, उमेश चंद्र पंत, नवीन वर्मा, जीवन जोशी, ओपी पांडे, टीसी उप्रेती, दीपक नौगाई आदि मौजूद थे।
रंग कर्मी बल्ली सिंह चीमा ने उकेरा दर्द
हल्द्वानी। एफटीआई में हुई गोष्ठी में रंगकर्मी बल्ली सिंह चीमा ने अपनी कविता के माध्यम से उत्तराखंड की दशा, दिशा और मौजूदा स्वरूप का मार्मिक वर्णन किया। उन्होंने अपनी कविता इस तरह पेश की।
कभी धान से कभी गेहूं से, तेरी मंडियों ने दगा दिया
मेेरी खेती से तुझे बैर है, तेरी नीतियों ने बता दिया
मैं किसान हूं, मेरा हाल क्या, मैं तो आसमां की दया से हूं
कभी मौसमों ने हंसा दिया, कभी मौसमों ने रूला दिया।
एक और कविता में उन्होंने जल, जंगल जमीन को बचाने की पैरवी की-
साथी जल, जंगल जमीन को बचाना बहुत जरूरी है
इसलिए अंधे विकास की सरकार से लड़ना जरूरी है।
प्रदेश में आई मुख्यमंत्रियों की बाढ़
हल्द्वानी। एफटीआई में हुई गोष्ठी में वक्ताओं ने इस बात पर हैरानी जताई कि प्रदेश के विकास की चिंता करने के बजाए पार्टियां अपने चहेतों को मुख्यमंत्री की गद्दी पर बिठाने की चिंता में अधिक मशगूल रहे। वक्ताओं ने कहा कि हिमाचल प्रदेश के गठन के 63 साल में वहां मात्र 6 मुख्यमंत्री बने हैं जबकि उत्तराखंड राज्य गठन के 19 साल में नौ मुख्यमंत्री बन चुके हैं।