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Nainital News: एनपीए लेने के बाद भी चला रहे प्राइवेट क्लीनिक

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हल्द्वानी। नॉन प्रैक्टिसिंग अलाउंस (एनपीए) लेने के बावजूद कई सरकारी डाॅक्टर निजी क्लीनिक चला रहे हैं या फिर किसी दूसरे के अस्पताल में डयूटी कर दोहरा लाभ ले रहे हैं। उनका यह फायदा मरीजों पर भारी पड़ रहा है। नियमानुसार डॉक्टर को 24 घंटे अस्पताल परिसर में मौजूद रहना चाहिए।
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सुशीला तिवारी राजकीय मेडिकल अस्पताल को ही ले लें। यहां 2200 से 2400 मरीजों तक की ओपीडी हो जाती है। कुमाऊं से लेकर मैदानी इलाकों और यूपी से भी मरीज बड़ी संख्या में इलाज कराने पहुंचते हैं। वहीं बेस अस्पताल में 1200 से 1400 की ओपीडी होती है। इसी तरह के कई अन्य सरकारी अस्पताल भी हैं। कुछ डॉक्टर सरकारी नियमों को अनदेखा कर खुले तौर पर निजी क्लीनिकों में मरीजों का इलाज कर रहे हैं। जबकि सरकार की ओर से एनपीए की मोटी रकम उन्हें मिलती है। कांट्रेक्ट के समय डॉक्टर से यह लिखवाया भी जाता है कि वह प्राइवेट प्रैक्टिस नहीं कर करेंगे। लेकिन पैसे की चकाचौंध के आगे नियमों का अनुपालन नहीं हो पा रहा है।
कई डाॅक्टर तो पकड़े जाने के डर से निजी प्रैक्टिस के नाम पर पर्चे पर अपना नाम नहीं लिखवाते हैं। दिल्ली में तो सरकारी अस्पताल के डॉक्टर निजी प्रैक्टिस कर ही नहीं सकते हैं। लेकिन उत्तराखंड के अस्पतालों में नियमों की सख्ती न होने से कई डॉक्टर इसका फायदा उठा रहे हैं। सरकार सख्ती करे तो इस प्रक्रिया पर तुरंत रोक लग सकती है। हालांकि सुशीला तिवारी राजकीय मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. अरुण जोशी का कहना है कि निजी प्रैक्टिस का कोई प्रकरण सामने नहीं आया है, अगर ऐसी कोई शिकायत सामने आती है तो नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
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अस्पतालों में दलालों का कब्जा
कई अस्पतालों में निजी सेंटर के दलालों का कब्जा बना हुआ है। ये लोग डॉक्टर के चैंबर से लेकर वार्ड तक घूमते रहते हैं और डॉक्टर को अपने जांच सेंटर पर मरीज भेजने के लिए दबाव डालते हैं। यह तब होता है जब डॉक्टर स्वयं इस कारोबार में घुस चुका होता है। सरकारी अस्पतालों में मशीन खराब होने का सबसे बड़ा फायदा निजी जांच सेंटरों को ही मिलता है। कुछ डाॅक्टर नियमों का पालन भी करते हैं और दलालों से दूर रहते हैं।
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कोट
निजी प्रैक्टिस नियमों के खिलाफ है। अगर किसी अस्पताल से शिकायत आती है तो उसकी जांच की जानी चाहिए। -आशुतोष सयाना, निदेशक चिकित्सा शिक्षा।
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