भवाली (नैनीताल)। सरकारी उपेक्षा के चलते जर्जर हालत में पहुंच चुके सैनिटोरियम में इलाज के लिए पहुंचने वाले मरीजों में अधिकांश मरीज उत्तर प्रदेश के रहते हैं। अस्पताल पहुंचने वाले उत्तराखंड के मरीजों की संख्या 20 से 30 फीसदी भी नहीं रहती है। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों की मानें तो डॉट्स योजना शुरू होने के बाद इलाज अधूरा छोड़ने वाले मरीजों की संख्या में खासी वृद्धि हुई है और यही मरीज अधूरे इलाज के बाद फिर से अस्पताल की ओर रुख करते हैं।
अस्पताल के आंकड़ों पर गौर करें तो करीब 207 अधिकारियों और कर्मचारियों वाले सैनिटोरियम में वेतन मद में ही हर माह करीब 70 लाख से अधिक की धनराशि खर्च होती है। दवा की व्यवस्था विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से निशुल्क होती है, लेकिन मरीजों के भोजन, रखरखाव और कर्मचारियों की वर्दी आदि में हर साल 25 लाख रुपये से अधिक खर्च होता है।
सालाना लाखों रुपए खर्च होने के बावजूद अस्पताल में पहुंचने वाले अधिकांश मरीज यूपी के मेरठ, मुरादाबाद, रामपुर, बरेली, शाहजहांपुर, बदायूं, पीलीभीत और बिलासपुर समेत आसपास के क्षेत्रों के होते हैं। इसके अलावा ऊधमसिंह नगर और नैनीताल से भी कुछ मरीज इलाज के लिए सैनिटोरियम पहुंचते हैं, जबकि प्रदेश के अन्य जिलों से इक्का-दुक्का मरीज ही स्वास्थ्य लाभ लेने के लिए यहां तक आते हैं।
अस्पताल के डॉक्टरों की मानें तो मौजूदा समय में अस्पताल में भर्ती होने वाले मरीजों में ऐसे मरीजों की संख्या अधिक है, जिन्होंने पहले डॉट्स योजना के तहत घर बैठे इलाज कराया और फिर अधूरे इलाज के बाद हालत बिगड़ने पर अस्पताल में भर्ती हुए। वर्तमान में 322 बेड वाले इस अस्पताल में 12 मरीज भर्ती हैं। अस्पताल के डॉक्टरों के मुताबिक जाड़ों में मरीजों की संख्या गर्मियों की तुलना में कम होती है। गर्मियों में यहां भर्ती होने वाले मरीजों की संख्या 200 तक पहुंच जाती है, जिनमें अधिकांश उत्तर प्रदेश के होते हैं।