नैनीताल। कुमाऊं विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग के प्राध्यापकों ने कृषि क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। उन्होंने बेकार खरपतवारों से उच्च गुणवत्ता वाला बायोचार तैयार किया है जो मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में संजीवनी साबित होगा।प्रो. एसएस बरगली और प्रो. किरन बरगली ने यह बायोचार विकसित किया है। उन्होंने काला बासा, बथुआ, मेथी, दूब घास और लकड़ी के अवशेषों को पायरोलिसिस प्रक्रिया से बायोचार में बदला। इस विधि में खरपतवारों को ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में 250 से 1000 डिग्री सेल्सियस तक के उच्च तापमान पर जलाया जाता है। इससे एक काला, छिद्रपूर्ण चारकोल प्राप्त होता है जिसे कृषि के लिए काला सोना भी कहा जाता है। प्रो. बरगली के अनुसार, यह बायोचार मिट्टी की भौतिक और रासायनिक स्थिति में सुधार करता है। यह मिट्टी की जल धारण क्षमता बढ़ाता है। साथ ही, यह सूक्ष्म पोषक तत्वों को नष्ट होने से रोकता है।
शोध टीम और महत्व
प्रो. बरगली की टीम में शोधार्थी डॉ. कविता खत्री, डॉ. भावना नेगी, डॉ. अर्चना फर्त्याल, वर्तिका जोशी, चारु जोशी, नीमा बिष्ट, गुरसाहिबा कौर, रुपाली पांडख्व और शिवांगी रावत शामिल हैं। यह प्रयास कृषि क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह न केवल बेकार खरपतवारों का सदुपयोग करता है बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी सहायक है। यह स्थानीय किसानों के लिए भी आय का एक नया स्रोत बन सकता है।