मुक्तेश्वर व आसपास के क्षेत्रों में बंजर खेतों में उगने वाला मशरूम युवाओं की आय का बेहतर जरिया बन रहा है। सात से दस हजार रुपये प्रति किलो के भाव बिकने वाले इस मशरूम की खोज के लिए बेरोजगार युवा जंगल छान रहे हैं। वह भी तब जबकि बेरोजगारों को मशरूम के बारे में बहुत अधिक जानकारी नहीं है। स्थानीय स्तर पर तो नहीं लेकिन कुछ बाहरी लोग इस मशरूम को खरीदने के लिए यहां पहुंच रहे हैं।
जानकारी के मुताबिक बेरोजगारों द्वारा बाहरी लोगों को बेचे जा रहे इस मशरूम को मोरल मशरूम कहा जाता है। बताया जाता है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी खूब मांग और खासी कीमत है। इसका उपयोग फाइव स्टार होटलों, रेस्टोरेंटों के अलावा दवाइयों के निर्माण में किया जाता है। स्थानीय बुजुर्ग टीकाराम ने बताया कि वह खुद काफी समय से मशरूम को बेच रहे हैं।
उन्होंने बताया की बारिश और गर्मी की वजह से इस मशरूम के लिए बेहतर वातावरण पैदा हुआ है। टीकाराम का कहना है कि मशरूम की सही जानकारी होना जरूरी है क्योंकि कई बार जंगली मशरूम खाने से लोग बीमार भी पड़ जाते हैं। होटल व्यवसायी सिद्धार्थ पांडे के मुताबिक इस मशरूम को गुच्ची भी कहते हैं। होटलों में इनका सूप, पुलाव, तंदूरी व्यंजन बनाने में प्रयोग किया जाता है जो कि काफी पौष्टिक होता है।
मुक्तेश्वर स्थित केंद्रीय शीतोष्ण बागवानी संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. बीएल अत्री का कहना है कि यह काफी पौष्टिक आहार तो है ही साथ ही इसका उपयोग दवाई बनाने वाली कई कंपनियां भी करती हैं। इसमें विटामिन डी और इम्यूनो एसिड तो मिलता ही है साथ ही इसमें एक खास विटामिन इम्यूनोएसिड (सीआईएस 3 -एमिनो-एल-प्रो लाइन) जो कि एंटी वायरल और ट्यूमर जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज में काम आता है, वह भी मौजूद है। यही नहीं हृदय संबंधी बीमारी, थकान, शिथिलता, स्तन कैंसर आदि की दवा बनाने में भी इसका उपयोग होता है।
उन्होंने बताया कि इसमें आयरन, जिंक, पोटैशियम, सिलेनियम पाया जाता है। इसका वानस्पतिक नाम मोर्चेल्ला एस्कुनेलेटा है। कुमाऊं में इसे च्यो भी कहते हैं। प्रभागीय वनाधिकारी डा. तेजस्विनी पाटिल का कहना है कि इस प्रजाति के मशरूम की बिक्री प्रतिबंधित नहीं है।