हल्द्वानी। भारत में करोड़ों विद्यार्थियों की मातृभाषा और पढ़ाई की भाषा समान नहीं होने के कारण शिक्षा अक्सर चुनौतीपूर्ण बन जाती है।
रोजगार या प्रतियोगिता की भाषा अंग्रेजी माध्यम होने से भी युवाओं का मातृ भाषा की ओर अपनापन कम दिखाई देता है। हालांकि नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में मातृ भाषा को बढ़ावा दिया गया है लेकिन इसके लिए सरकारी प्रयास ही पर्याप्त नहीं हैं। मातृ भाषा में परवरिश से परिवार के साथ साथ संस्कार भी जुड़ेंगे।
मातृ भाषा को लेकर कार्य कर रहीं और महिला शिक्षिकाओं का कहना है कि हिंदी शोध के क्षेत्र में युवाओं की संख्या तो बढ़ रही है लेकिन अभी रफ्तार काफी कम है। शुरुआती शिक्षा से हिंदी को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। रोजगार और सरकारी कामकाजों में मातृ भाषा को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। जब मातृ भाषा को रोजी रोटी से जोड़ेंगे तब यह उन्नति के शिखर तक पहुंचेगी
अंग्रेजी स्कूलों में हिंदी अनिवार्य की जानी चाहिए : प्रो. बीना
हल्द्वानी। चीन, जापान जैसे देशों में मातृभाषा में तकनीकी शिक्षा दी जाती है। जब रोजगार अंग्रेजी भाषा से मिलेगा तो मातृभाषा को कैसे बढ़ावा मिलेगा। सरकार का कामकाज मातृभाषा में हो, प्राथमिक के अलावा उच्च शिक्षा में विश्वविद्यालयों की ओर से प्रयास हो। बच्चों में हिंदी लेखन को बढ़ावा मिले। अंग्रेजी स्कूलों में हिंदी अनिवार्य की जानी चाहिए। कहीं कहीं यह है लेकिन वैकल्पिक रूप में है। सरकारी प्रयास बढ़ने चाहिए। - प्रो. बीना मथेला, हिंदी विभाग, राजकीय स्नातकोतर महाविद्यालय हल्द्वानी
मातृभाषा हमें संस्कार सिखाती है : डॉ. प्रभा साह
मातृभाषा के कारण ही हम संस्कारों और परिवारों से जुड़ते हैं। भाषा से जुडे़ंगे तो संस्कार से भी जुड़ेंगे। हिंदी में गिनती का ज्ञान आजकल के युवाओं को नहीं है यह परवरिश का नतीजा है। हिंदी भाषा में शिक्षा अनिवार्य हो, सरकारी कामकाज हिंदी में हो तभी बच्चों में रुझान विकसित कर सकते हैं। क्योंकि घर पहली पाठशाला और माता पिता पहले शिक्षक होते हैं इसलिए यह शुरुआत घर से हो। दूसरा हिंदी के साथ क्षेत्रीय भाषा को भी बढ़ावा दिया जाना चाहिए। - डॉ. प्रभा साह, राजकीय स्नातकोतर महाविद्यालय हल्द्वानी।