नैनीताल। उत्तराखंड की लोक संस्कृति और भाषाई विरासत को डिजिटल युग में जीवित रखने के लिए कुमाऊं विश्वविद्यालय के हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषा विभाग ने एक अनूठा कदम उठाया है। विभाग ने विलुप्त हो रही क्षेत्रीय बोलियों, विशेषकर खसपर्जिया और सोर्याली पर फोकस करते हुए दो हजार महत्वपूर्ण शब्दों का डिजिटल मेटाडाटा और ऑडियो रिकॉर्डिंग तैयार कर ली है। प्रोजेक्ट का मुख्य वेब पृष्ठ अंतिम चरण में है और इसी माह इसके लाइव होने की उम्मीद है।
इस भाषाई संग्रह का मुख्य केंद्र अल्मोड़ा जिले के ग्रामीण अंचलों में बोली जाने वाली खसपर्जिया व पिथौरागढ़ सीमांत क्षेत्र की मिठास से भरी सोर्याली बोली है। आधुनिकता की दौड़ में इन बोलियों के मूल शब्द और उनके पारंपरिक उच्चारण धीरे-धीरे कम हो रहे हैं। इसी को देखते हुए विश्वविद्यालय ने इनका वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण किया है। बोलियों के दो हजार शब्दों को केवल दर्ज ही नहीं किया गया, बल्कि इन्हें हिंदी और कुमाऊंनी के दो अलग-अलग भाषाई रूपों के साथ-साथ अंग्रेजी और अंतरराष्ट्रीय ध्वन्यात्मक वर्णमाला में भी ढाला गया है।
इस तकनीकी प्रारूप से वैश्विक स्तर के भाषा वैज्ञानिक और शोधकर्ता भी इन बोलियों के सटीक उच्चारण और व्याकरण को आसानी से समझ सकेंगे। इस अमूल्य डिजिटल डेटाबेस को दुनिया भर के पाठकों तक पहुंचाने के लिए इसे लखनऊ की प्रतिष्ठित संस्था एसईएल और उत्तराखंड की प्रसिद्ध पहाड़ पत्रिका की आधिकारिक वेबसाइट पर होस्ट करने की योजना है।
- हमारा मुख्य उद्देश्य उत्तराखंड की समृद्ध भाषाई विरासत को डिजिटल माध्यम से वैश्विक पहचान दिलाना है। विलुप्त हो रही अल्मोड़ा की खसपर्जिया और पिथौरागढ़ की सोर्याली बोलियों को सहेजने के लिए यह 2,000 शब्दों का डिजिटल शब्दकोश तैयार किया गया है। हिंदी, कुमाऊंनी, अंग्रेजी और आईपीए फॉर्मेट का यह अनूठा प्रोजेक्ट इसी माह कुमाऊं विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर लाइव कर दिया जाएगा। - प्रो. चंद्रकला रावत, प्राध्यापक हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषा विभाग डीएसबी परिसर नैनीताल।