नैनीताल। पहाड़ों की ऊंची चोटियों के आंचल में बसा जीवन जितना सुंदर है, उतना ही कठोर भी। इन्हीं दुर्गम रास्तों पर बीते दो दशकों से कंचन भंडारी एक ऐसी मशाल जला रही हैं जिसने हजारों घरों के अंधेरे को उम्मीद में बदल दिया है। मातृ दिवस के अवसर पर उनकी यह यात्रा मातृत्व के उस स्वरूप को परिभाषित करती है जो केवल जन्म देने तक सीमित नहीं बल्कि समाज को संरक्षण देने का नाम है।
नैनीताल के ग्रामीण अंचलों में कंचन ने विमर्श के माध्यम से उन महिलाओं को एकजुट किया जो घरेलू हिंसा को अपनी नियति मान चुकी थीं। उन्होंने गांव-गांव चौपाल लगाकर महिलाओं को उनके कानूनी अधिकारों के प्रति जागरूक किया और उन्हें एक-दूसरे की ढाल बना दिया। शिक्षा के प्रति उनका समर्पण भी अतुलनीय है।
दुर्गम गांवों के उन बच्चों के लिए जो गरीबी के कारण स्कूल से दूर थे, कंचन एक मार्गदर्शक बनकर आईं। उन्होंने अभिभावकों की काउंसलिंग की और हजारों नौनिहालों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ा।
उत्तराखंड सरकार ने उनके इन प्रयासों के लिए उन्हें तिलू रौतेली पुरस्कार से भी सम्मानित किया है। आज कंचन भंडारी पहाड़ की उन हजारों महिलाओं और बच्चों के लिए भरोसे का दूसरा नाम बन चुकी हैं।
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