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जोहार के रंग में रंगा हल्द्वानी

Sun, 15 Nov 2015 01:46 AM IST
ब्यूरो /अमर उजाला, हल्द्वानी (नैनीताल)।
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जोहार महोत्सव में पारंपरिक वेशभूषा गादी कमला से सजी महिलाओं ने कुमाऊंनी वाद्य यंत्रों की थाप पर नृत्य के साथ झांकी निकालकर महोत्सव का शुभारंभ किया।
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जोहार सांस्कृतिक एवं वेलफेयर सोसायटी की ओर से आयोजित दो दिनी छठे जोहार महोत्सव का आगाज शनिवार को दो नहरिया स्थित शिव सुंदरम बैंक्वेट हॉल में हुआ।

कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि मेयर डा. जोगेंद्र सिंह रौतेला और विशिष्ट अतिथि डा. शेर सिंह पांगती और भूपाल सिंह पांगती ने किया।

जोहार संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन का पर्याय बन चुके जोहार महोत्सव के पहले दिन पारंपरिक वेशभूषा में सजी जोहारी महिलाओं ने सरस्वती वंदना कर मां का आहृवान किया, तो मां नैना लोक सांस्कृतिक कला मंच खटीमा के कलाकारों ने ओ नंदा सुनंदा तु दैंड़ है जाए की प्रस्तुती देकर लोगों को भावविभोर कर दिया।

 इसके बाद पुष्कर मेहरा एंड पार्टी ने लाली ओ होंसिया लाली के साथ ही छपेली गाकर सभी को नाचने पर मजबूर कर दिया।

नृत्य के माध्यम से कलाकारों ने ऐजा रे रंग रंगिलो नीलम जोहारा गाकर मुनस्यारी की घाटी में आने का निमंत्रण दिया। शाम को हुए कार्यक्रम की मुख्य अतिथि वित्त मंत्री डा. इंदिरा हृदयेश और विशिष्ट अतिथि डीआईजी पुष्कर सिंह सैलाल व इंकम टैक्स आयुक्त नरेंद्र सिंह जंगपांगी रहे।
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इस दौरान जोहारी महिलाओं, पुरुषों, युवक-युवतियों व बच्चों ने एकल नृत्य प्रस्तुत कर विभिन्न संस्कृतियों की छटा बिखेरी तो जोहारी बोली में हुए हास्य व्यंग ने लोगों को गुदगुदाया।

विभिन्न संस्थाओं से आये बच्चों ने मंच के माध्यम से अपनी वाद्य यंत्र कौशलता का परिचय दिया। इस मौके पर सोसायटी अध्यक्ष देवेंद्र सिंह धर्मसत्तू, महासचिव भूपेंद्र सिंह पांगती, सचिव नरेंद्र सिंह टोलिया, गजेंद्र सिंह पांगती समेत बड़ी संख्या में लोगों ने शिरकत की।

मडुवे की महक और चूख की चटक का लिया स्वाद
जोहार संस्कृति के व्यंजनों में अपनी विशिष्ट पहचान रखने वाली मडुवे की रोटी और तिमूर की चटनी के साथ ही लोगों ने नींबू के चूख और पालक के साग का भरपूर स्वाद लिया। साथ ही, विभिन्न तरीकों से बना मीट चावल भी लोगों की पसंद बना।

टोपी व जैकेट पहन कर गये घर
हिम कुटीर संस्थान मुनस्यारी के कपड़े व मसाले, कौसानी हथकरघा उद्योग के शाल, टोपी व जोहार सांस्कृतिक एवं वेलफेयर सोसायटी के बांस से बने दुम्का, पेन स्टेंड और सूप की भी लोगों ने जमकर खरीदारी की। कुमाऊंनी टोपी व जैकेट खरीदारों की पहली पसंद बना।

मसालों के साथ छाई  मुनस्यारी की राजमा
महोत्सव में लगे स्टालों में उच्च हिमालयी क्षेत्रों में पैदा होने वाले मसालों और जड़ी बूटियों को किसी ने घरेलू इलाज के लिए लिया तो कोई इन्हें अपने किचन का स्वाद बढ़ाने के लिए ले गया। जंबू, गंदरैणी, कुट, कुटकी, गोकुल मासी, काला जीरा, लाल जड़ी, रतन जोत सहित मुनस्यारी की प्रसिद्ध राजमा को लोग अपने साथ ले गए।
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मुनस्यारी से अंगोरा तिब्बत से आई चौर पूंछ
महोत्सव में मुनस्यारी के प्रसिद्ध अंगोरा ऊन से बने शाल, मफलर, टोपी और बनियान शामिल रही तो तिब्बत के तकला कोट मंडी से आई चार हजार रुपये कीमत की चौर पूंछ (याक की पूंछ) आकर्षण का केंद्र रही। इसे पूजा में प्रयोग किया जाता है।

व्यंजन
मडुवे की रोटी, तिमूर की चटनी, भुमला (फ्राइड राइस), ज्या (नमकीन चाय), खज्जा (च्यूड़ा), साबूत पालक का साग, तिमूर सूप, चिकन चावल, मटन चावल

मसाले, जड़ी-बूटी
जंबु- सब्जी के छौंके में प्रयोग होने वाला मसाला
गंदरैणी-खांशी व अजीर्ण में कारगर
कुट- गैस का इलाज
गोलू- चोट में कारगर
रत्न जोत- चर्म रोग का इलाज
गोकुल मासी- लकड़ी के कोयलों में जलने वाली धूप
राजमा, मडुवे का आटा, काला जीरा, बड़ी, बांस का अचार, पापड़
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