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झापा के दम पर दवानल पर काबू

Mon, 25 May 2015 01:02 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, हल्द्वानी
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वनों की आग बुझाने के नाम पर तमाम योजनाएं बनती हैं, पर इसमें कई तरह के खेल होते हैं। उपकरण खरीदे जाते हैं, यह कितने कारगर हैं, इसे देखने की फुर्सत वनाधिकारियों को नहीं होती है। वक्त बदल गया है, पर दुर्गम, पहाड़ी इलाके में आग बुझाने का पुराना ही तरीका कारगर साबित हो रहा है। इसी के दम पर दवानल को काबू किया जा रहा है।
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हर बार गर्मी में जंगल धधक उठते हैं। इस पर काबू पाने को तमाम फार्मूले एवं योजनाएं अपनाई गई। वनाधिकारियों के अनुसार इसमें पुराने आजमाए तरीके ही कारगर साबित हो रहे हैं। वनाधिकारी कहते हैं कि आग बुझाने के व्यावहारिक और ज्यादा कारगर दो ही तरीके हैं। इसमें पहला पेड़ों की शाखाओं या झाड़ियों से बनाया गया एक तरह का झाडू़ (झापा) है। आग लगने के बाद अगर पहाड़ी या दूसरी जगहों से उपकरण लेने गए, तो आग और बढ़ सकती हैं। ऐसे में वन कर्मी एवं स्थानीय लोग झापा बनाकर और आग वाली जगहों पर पीटते हैं, जिसे आग काबू में आती है।

इसके अलावा काउंटर फायर भी एक तरीका है। तराई पूर्वी वन प्रभाग डीएफओ डा. पराग मधुकर धकाते कहते हैं कि जहां पर आग लगी होती है, उससे कुछ दूरी पर नियंत्रित तरीके से आग लगाई जाती है। जब दोनों आग मिलती हैं, तो जलने के लिए आक्सीजन नहीं मिलती है और आग बुझ जाती है।
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झापा की खूबी
- इसे ढो कर ले जाने की जरूरत नहीं होती
- हल्का होता, काम करना आसान होता
- लोहे के उपकरण गर्म हो जाते हैं, इसमें नहीं होता है
- खराब होने पर तत्काल बदल सकते हैं
- विश्व बैंक के प्रोजेक्ट में इसे कारगर माना गया था

यह उपकरण दिए गए
करीब दो साल पहले वनाग्नि नियंत्रण को लेकर उपकरण खरीद की कोशिश शुरू हुई, तो विवाद हो गया। काफी समय तक खींचतान चली थी। इस बार वन कर्मियों को टार्च वाली टोपी, लोेेहे की झाड़ू किट आदि दी गई।
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