खुदा न करे शहर में कहीं आग लगे, क्योंकि फायर ब्रिगेड के पास आग पर काबू पाने के लिए कोई संसाधन नहीं है। और पुलिस, वह तो मौके पर ढंग की टॉर्च लेकर नहीं भी पहुंची। रविवार की देर रात सुमसंस में लगी आग के दौरान यही हाल दिखा।
दुकानदार बेबस थे और पास-पड़ोसी मूकदर्शक। ऐसे में शहर को हाईटेक बनाने के दावे कमजोर दिखते हैं। मुख्य मार्ग पर हुए हादसे ने ही व्यवस्था की पोल खोल दी, अगर किसी संकरी गली में आग लगी होती तो अंजाम का अंदाजा खुद ही लगाया जा सकता है।
रात करीब डेढ़ बजे यूनिफार्म की दुकान सुमसंस से राहगीरों ने धुआं उठते देखा। तत्काल पुलिस और फायर ब्रिगेड को सूचना दी। कोतवाली से दो सौ मीटर और मंगल पड़ाव चौकी से महज कुछ कदम दूरी पर हादसा होने की वजह से तत्काल टीमें पहुंच गईं, लेकिन यह क्या?
दमकल कर्मियों के पास तीन मंजिला इमारत में लगी आग बुझाने के लिए जरूरत भर के सामान भी नहीं थे। न सीढ़ी थी, न शटर काटने या उठाने का उपकरण। हद तो यह है कि वाहन पर सर्च लाइट भी नहीं थी। कर्मचारी अंधेरे में ही जूझते रहे। 40 मिनट के बाद शटर उठाया जा सका, लेकिन तब तक अंदर ही अंदर आग ने विकराल रूप ले लिया था।
करीब दो बजे सीओ अरविंद सिंह ह्यांकी दल-बल के साथ पहुंचे, वह भी खाली हाथ। पुलिस एक टॉर्च का इंतजाम नहीं कर सकी। हालात यह रहे कि लोग अपने मोबाइल की टॉर्च जलाकर जुटे हुए थे। कभी रोडवेज की बस को रोककर उसकी हेडलाइट से रोशनी की गई तो कभी सीओ की गाड़ी की लाइट जलाई गई।
बिजली कर्मियों ने भी धुप अंधेरे में पोल पर चढ़कर रामपुर रोड और बरेली रोड के कनेक्शन काटे, जिससे अन्य क्षेत्रों की आपूर्ति सुचारू कराई जा सकी। इस बीच एक फायर ब्रिगेड ने दुकान के पीछे जाकर आग पर काबू पाने की कोशिश की। सामने के मकान की छत से सुमसंस का चैनल काटने का निर्णय लिया।
पुलिसकर्मी लंबे बांस से चैनल को तोड़ने लगे, इससे लोहे का चैनल तो क्या टूटता, बांस ने ही आग पकड़ ली। सेंचुरी पेपर मिल की फायर ब्रिगेड मंगाई गई। उनकी टॉर्च मिली तो बचाव कार्य में लगी टीम हिम्मत जुटाकर दुकान के कुछ अंदर घुस सकी।
सुबह सात बजे तक बिना संसाधन यूं ही जूझते रहे, लेकिन आग बुझने के बजाए बढ़ती ही गई। सुबह को लोडर मंगवाकर ऊपरी मंजिल से पानी की बौछार मारी गई, तब कुछ काबू पाया जा सका।