नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में कटौती के बाद भी आम जनता को महंगाई से राहत नहीं मिली है। डीजल की कीमतें गिरने से ट्रांसपोर्टरों ने भाड़ा जरूर कम किया, लेकिन खुदरा बाजार में इसका असर नहीं दिखा है। चावल की कीमत छोड़ दी जाए तो बाकी सभी खाद्य सामग्री और फल एवं सब्जियां महंगी हुई हैं।
पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें प्रत्यक्ष रूप से बाजार को प्रभावित करती हैं। डीजल महंगा होते ही बोझ आम आदमी की जेब पर पड़ता है। ढुलाई भाड़ा महंगा होने से दैनिक उपभोग का हर सामान महंगा हो जाता है। विगत छह महीने में डीजल में करीब सवा बारह रुपए कटौती हुई है, लेकिन इससे उपभोक्ताओं को राहत मिलती नहीं दिख रही है।
ट्रांसपोर्टर प्रदीप सब्बरवाल बताते हैं, डीजल की कीमतों में कटौती से मैदान में आठ रुपए और पहाड़ में दस रुपए प्रति क्विंटल भाड़े में कमी हुई है। इस पर भी लोडर संतुष्ट नहीं हैं। थोक व्यापारी विपिन गुप्ता बताते हैं, डीजल की कीमतों में कटौती का असर बाजार पर नहीं पड़ा है। अधिकतर दालें इंदौर और छत्तीसगढ़ से आती हैं।
बाकी खाद्य सामग्री भी वाया दिल्ली की मंडियों से होकर हल्द्वानी तक पहुंचता है। दालों और दैनिक उपभोग की खाद्य सामग्री की कीमतें स्थिर हैं। फुटकर किराना व्यापारी राजन नागपाल बताते हैं, चावल की कीमत गिरी है। इसकी वजह भी नया चावल का मार्केट में आना है।
सरबती 50 से कम होकर 30 और बासमती 100 से 70 रुपए प्रति किलो आया है। दालों में मलका और अरहर प्रति किलो पांच से 10 रुपए किलो महंगी हुई हैं। वहीं, फल एवं सब्जियों की कीमतों में भी कोई राहत नहीं है। थोक मंडी में भले कुछ कीमतें कम हुई हैं, लेकिन फुटकर बाजार में फल-सब्जियां उपभोक्ताओं की जेब पर भारी पड़ रही हैं।
बाजार में कुल्लू का सेब 100, अंगूर 100, अनार 150, पपीता और तरबूज 40-40 रुपए किलो बिक रहा है। केला 40 रुपए दर्जन पहुंच गया है। इस महंगाई में आम उपभोक्ता अच्छे दिनों की शुरुआत के लिए टकटकी लगाए बैठा है।