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हिंदी, उर्दू, गुजराती, मराठी, सबके पीछे अंग्रेजी लाठी

Wed, 14 Sep 2016 01:12 AM IST
गिरीश रंजन तिवारी
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hindi news - फोटो : demopic
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बात बुरी लगती है लेकिन हिंदी दिवस पर हिंदी के विकास को छटपटाते देश में  ऐसे विरोधाभास और भाषाई दुराग्रह हैं जो विश्व में कहीं नहीं हैं। विश्व में सर्वाधिक प्रयुक्त होने वाली पहली दो भाषाओं में शुमार होने के बावजूद अपने ही देश में हिंदी का विरोध होना इसमें से एक है।
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बॉलीवुड विश्व का सबसे बड़ा फिल्म उद्योग है। विश्व के सर्वाधिक कमाऊ फिल्मी सितारों में हिंदी फिल्मों के दो कलाकार शामिल हैं, लेकिन हिंदी फिल्मों की बदौलत ये मुकाम हासिल करने वाले सितारे फिल्मों के बाहर कहीं भी हिंदी बोलने से परहेज करते हैं।

जहां यह उद्योग फलफूल रहा है, उसी मुंबई में आए दिन हिंदी भाषियों को विरोध झेलना पड़ता है। यही हाल दक्षिण व पूर्वोत्तर राज्यों का है। अपनी-अपनी भाषा की लड़ाई की वजह से  भारत एक ऐसा देश बन गया है, जहां सारी भाषाओं की आपसी लड़ाई से बैर भाव फैलता है और इनमें एक विदेशी भाषा अंग्रेजी के बूते एकता बनी हुई है।
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तमाम देशों में हिंदी की पढ़ाई पर जोर दिया जा रहा है इसके माध्यम से रोजगार औैर व्यापार के अवसर बढ़े हैं। अमेरिका ने भारत संबंधी अपनी नीति में परिवर्तन कर तमाम वेबसाइटों को हिंदी में तैयार किया है औैर स्वीकारा है कि हिंदी के महत्व को समझने में उससे भूल हुई।

लेकिन गत वर्ष जब भारत सरकार ने सरकारी अधिकारियों से सोशल मीडिया में हिंदी का प्रयोग करने का सुझाव जारी किया तो देश में मानों भूचाल आ गया और सरकारी प्रवक्ता को इस पर सफाई देते हुए सुझाव वापस लेना पड़ा और सफाई भी उन्होंने अंग्रेजी में दी।

हाल में हिंदी न्यूयार्क में विश्व हिदी सम्मेलन के दौरान  साफ स्पष्ट हिंदी बोलने वाले स्वीडन निवासी हेंज बर्नर ने बताया कि अमेरिका में किसी मुकदमे में ज्यूरी के समक्ष शिकायत कर्ता हिंदी में बात करना चाहे तो उसे हिंदी ज्यूरी उपलब्ध करायी जाती है क्यों कि उनका मानना है कि अपने मनोभावों को सही तरीके से केवल अपनी मातृभाषा में ही व्यक्त किया जा सकता है। 

भारत में अदालतें अंग्रेजी बोलने पर जोर देती हैं जिसमें वादी को ये पता नहीं चलता कि वकील ने दलील क्या दी, जज ने सवाल क्या पूछे और क्या निर्णय सुनाया। रोजमर्रा के कार्यों में हिंदी कोई बाधा नहीं है।

इस संबंध में भारतीय रक्षा अनुसंधान एवं विकास संस्थान डीआरडीओ का उदाहरण प्रासंगिक है। उसने भारत में विकसित समस्त युद्धक मिसाइलों का नामकरण हिंदी में किया है। इसमें अग्नि, पृथ्वी, धनुष, प्रहार, शौर्य, ब्रह्मोस, आकाश, त्रिशुल, निर्भय शामिल हैं, जो बहुत प्रचलित व लोकप्रिय हुए हैं।

सरकारी विभाग वास्तविक प्रयोग में हिंदी अपनाएं तो एक सार्थक योगदान दे सकते हैं। लेकिन हिंदी के प्रति जब तक हिंदी भाषी ही दुराग्रह न पालें तो राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय पटल पर केवल हिंदी दिवस के माध्यम से इसकी स्वीकार्यता नहीं बढ़ने वाली।

खास बात यह है कि हिंदी के मुकाबले बेहद कम बोली जाने वाली जापानी, स्पेनिश, फ्रेंच, जर्मनी, थाई भाषाओं वाले देश अंग्रेजी को बिल्कुल नहीं जानते बल्कि अंग्रेजी को हेय दृष्टि से देखते हैं और अपने क्षेत्रों में अग्रणी हैं।

यह भ्रम केवल भारत में है कि अंग्रेजी के बगैर  काम नहीं चलता। समूचे एशिया में भारत के अलावा केवल पाकिस्तान और फिलीपींस में अंग्रेजी प्रयुक्त होती है। भारत में भी मात्र तीन फीसदी लोग बोल पाते हैं फिर भी हम इसे सफलता की सीढ़ी मानते हैं।
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