नैनीताल। ज्योलीकोट के जंगल में 50 वर्षीय हेमा पांडे की वन्यजीव हमले में हुई मौत ने एक बार फिर पहाड़ के गांवों में गहराते संकट को उजागर किया है। यह घटना जंगलों में बढ़ती आग और सिमटते वन्य आवास के कारण वन्यजीवों के आबादी की ओर आने का परिणाम है। हेमा पांडे घर के पशुओं के लिए घास और ईंधन जुटाने जंगल गई थीं लेकिन वापस नहीं लौटीं। उनका अधखाया शव मिलने से पूरे इलाके में दहशत फैल गई है।
ब्लॉक प्रमुख डॉ. हरीश बिष्ट ने कहा, यह मौत सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि पहाड़ के बदलते हालात की चेतावनी है। उन्होंने बताया कि जंगल जो कभी जीवन का सहारा थे अब खतरे का पर्याय बनते जा रहे हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि जंगलों में आग लगने से वन्यजीवों का दबाव गांवों की ओर बढ़ गया है जिससे महिलाएं सबसे ज्यादा खतरे में हैं। वन विभाग अभी तक यह पुष्टि नहीं कर पाया है कि हमलावर बाघ था या तेंदुआ। नैनीताल डिवीजन में पिछले दो वर्षों में वन्यजीव हमलों में कई लोगों की जान गई है और इस साल यह संख्या लगातार बढ़ रही है।
संकट के स्थायी समाधान की मांग
इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या जंगलों को बचाए बिना और ग्रामीणों को बुनियादी सुविधाएं दिए बिना इस संकट से निपटना संभव है। आज जरूरत केवल हमलावर जानवर को पकड़ने या मारने की नहीं है बल्कि जंगलों की सुरक्षा, आग पर प्रभावी नियंत्रण और ग्रामीणों की सुरक्षा के स्थायी इंतजाम आवश्यक हैं। इन उपायों से ही भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सकता है।
वन्यजीव मानव संघर्ष की घटनाओं को रोकने के लिए विभाग हर संभव प्रयास कर रहा है। साथ ही लोगों को लगातार वन्यजीवों के व्यवहार को समझाने का प्रयास कर रहा है ताकि मानव वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं में रोक लग सकें। -आकाश गंगवार, डीएफओ नैनीताल