ढूंढ लेते हैं अंधेरों में मंजिल अपनी क्योंकि जुगनू कभी रोशनी के मोहताज नहीं होते... नेशनल एसोसिएशन फॉर ब्लाइंड (नैब) के आवासीय परिसर में रहने वाले दिव्यांग इन पंक्तियों को सार्थक करने में जुटे हैं। उनके भी सपने हैं। आगे बढ़ने की ख्वाहिशें हैं। औरों की तरह बेहतर भविष्य की उम्मीद वे भी पाले हैं।
भले ही खुद के अभिभावक और समाज ने उन्हें उपेक्षित किया हो, मगर नैब उनकी हसरतों पर पंख लगाने में जुटा है। किसी की आंखों में रोशनी नहीं है, कोई ठीक से बोल नहीं सकता लेकिन समाज में मुकाम बनाने की उनकी ललक किसी सामान्य बच्चे से कमतर नहीं है। दिव्यांगों में आपसी मेलजोल ऐसा कि पढ़ाई से लेकर हर काम में एक दूसरे की मदद करने में तत्पर रहते हैं।
गौलापार स्थित नैब में वर्तमान में 82 बच्चे रहकर भविष्य संवार रहे हैं। नर्सरी से लेकर डिग्री कॉलेज तक में पढ़ने वाले बच्चों में 48 छात्राएं हैं। बच्चों में से 12 छात्र और 21 छात्राओं की रोशनी पूरी तरह से खत्म है लेकिन शारीरिक कमियों के बावजूद वे अच्छे भविष्य का सपना संजोकर मेहनत में जुटे हैं।
कोई शिक्षक, कोई आईएएस अफसर तो कोई बैंक अधिकारी बनना चाहता है। इसके लिए वे पढ़ाई में खूब मेहनत करते हैं। नैब संचालक श्याम धानक और अन्य शिक्षक-शिक्षिकाएं उनके हौसलों को उड़ान दे रहे हैं। 15 बच्चे प्राइवेट स्कूल, तीन डिग्री कॉलेज और बाकी प्राइमरी, जूनियर और इंटर कॉलेजों में पढ़ाई कर रहे हैं।
स्कूल जाने वाले बच्चों की पढ़ाई में मदद के लिए संस्था में भी कक्षाएं चलाई जाती हैं। प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की समझदारी बढ़ाने और होमवर्क के लिए विशेष शिक्षक हैं। यही वजह है कि ये बच्चे अपना परिचय भी अंग्रेजी में देते हैं।
पढ़ाई के साथ ही कईं बच्चे गायन, नृत्य के साथ ही वाद्य यंत्रों को बजाने में महारथ हासिल कर चुके हैं। नैब की वार्डन मीना सिंह कहती हैं कि इन बच्चों ने दूसरे सामान्य बच्चों की तरह ही सुनहरे भविष्य के ख्वाब बुने हैं। एक साथ रहने की वजह उनका मेलजोल इस कदर बढ़ा है कि वे पढ़ाई में एक दूसरे की मदद तो करते ही हैं, साथ ही अन्य कामों में भी हाथ बंटाते हैं।
ये है बच्चों की दिनचर्या
सोमवार से शनिवार तक बच्चे रोजाना सुबह स्कूल जाते हैं। स्कूल से आकर भोजन के बाद विषय के अनुसार कक्षाएं चलती हैं। ये क्रम पांच बजे तक चलता है और उसके बाद कंप्यूटर, योगा, संगीत सिखाया जाता है। करीब आठ बजे खाना खाने के बाद 10 बजे तक बच्चे पढ़ाई करने के बाद सो जाते हैं।
वैसे सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को हफ्ते में दो या तीन दिन ही स्कूल भेजा जाता है। संस्था के शिक्षक ही कक्षाएं लगाकर उनको पढ़ाते हैं।
रविवार के दिन बच्चे अपने कपड़ों, कमरे, अल्मारी की सफाई के साथ ही प्रेस करते हैं। छोटे बच्चों से कपड़े नहीं धुलवाए जाते हैं। दिन में खाना खाने के बाद वे आराम करते हैं और शाम को योगा की कक्षा, खेलने के बाद रात आठ बजे खाना खाते हैं। 10 बजे तक पढ़ने के साथ वे सो जाते हैं।
पढ़ाई के लिए आधुनिक यंत्रों का इस्तेमाल
नैब में पढ़ने वाले नवीं से बारहवीं के विद्यार्थियों को पढ़ने में मदद के लिए आधुनिक यंत्र मुहैया कराए गए हैं। किताब में लिखे शब्द को बड़े रूप में देखकर पढ़ने के लिए मेग्नीफायर दिए गए हैं। प्लेक्स टाक्स में सेलेबस अपलोड कर उसे सुनते हैं।
इसे बच्चे लिसनिंग डिवाइस कहते हैं। वहीं कंप्यूटर सीखने के लिए स्क्रीन रीडिंग साफ्टवेयर का इस्तेमाल किया जाता है। बच्चे कहते हैं कि बड़ी कक्षाओं में सेलेबस बहुत होता है इसलिए इन यंत्रों से पढ़ाई में बहुत मदद मिलती है। ब्रेल का एक पेज पढ़ने में दो से तीन मिनट लग जाते हैं, वहीं लिसनिंग डिवाइस से इतने ही समय में दो से तीन पेज का अध्ययन हो जाता है।