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मां पूर्णागिरि धाम के मेले के संचालन से हाथ खींच सकती है जिला पंचायत!

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मां पूर्णागिरि धाम के मुख्य मंदिर में देवी मां की मूर्ति। - फोटो : CHAMPAWAT
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चंपावत। जिला पंचायत ने पूर्णागिरि मेले के संचालन से अपने हाथ खींच लिए हैं। जिला पंचायत अध्यक्ष ज्योति राय ने शुक्रवार को अपनी मंशा जाहिर करते हुए कहा है कि मेले से होने वाली आय 2011 से पहले की तरह जिला पंचायत के कोष में जमा कराए जाने पर ही जिला पंचायत मेला संचालित करेगी। इस संबंध में जिला पंचायत अध्यक्ष ने मुख्यमंत्री और पर्यटन मंत्री को बाकायदा इस संबंध में पत्र भी भेज दिया है।
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जिला पंचायत अध्यक्ष ज्योति राय ने शुक्रवार को कहा कि तीन माह पूर्णागिरि मेले से होने वाली आय जिला पंचायत के खाते में जमा नहीं कराए जाने की सूरत में जिला पंचायत मेले का संचालन नहीं करा सकेगी। उन्होंने कहा कि मेले के संचालन के लिए वित्तीय संसाधन जुटाना कठिन हो रहा है। ज्योति राय ने बताया कि उन्होंने इस संबंध में मुख्यमंत्री और पर्यटन मंत्री को पत्र भेजा है।
फोटो 22 सीपीटी 04पी
2010 तक जिला पंचायत के खाते में जमा होती थी आय
चंपावत। 2010 तक पूर्णागिरि के मेले में पार्किंग, बाल मुंडन, तहबाजारी, साइकिल स्टैंड आदि के ठेकों से होने वाली एक करोड़ रुपये से अधिक की आय जिला पंचायत के खाते में जमा होती थी लेकिन 2011 से यह राशि जिला पंचायत के कोष में जमा होने के बजाय मेला कमेटी के खाते में जमा हो रही है। इसी आमदनी से पंचायत मेले के आयोजन पर होने वाले खर्च को वहन करती थी। अब पंचायत को अपनी मद से खर्च का बड़ा हिस्सा लगाना होता है। जिला पंचायत ने दिसंबर 2019 में बोर्ड की बैठक में मेले से होने वाली आय पंचायत के खाते में जमा करने का प्रस्ताव भी पारित किया था। लेकिन इस पर कुछ हुआ नहीं।
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कोट
मां पूर्णागिरि धाम का मेला जिला पंचायत 2010 तक भव्य तरीके से कराती थी। साथ ही मेला पंचायत की आमदनी का महत्वपूर्ण स्रोत भी था लेकिन 2011 से मेले की व्यवस्था पंचायत को अपने संसाधनों सेे करनी पड़ रही है। इससे उसे आर्थिक नुकसान हो रहा है।- ज्योति राय, अध्यक्ष, जिला पंचायत। (22 सीपीटी 05पी)
1985 से मेले का संचालन कर रही जिला पंचायत
जिला पंचायत 1985 से इस मेले को संचालित कर रहा है। 2010 तक मेले से प्राप्त राशि जिला पंचायत की आय का प्रमुख स्रोत होता था। बूम से लेकर मां पूर्णागिरि के मुख्य मंदिर तक का 12 किमी का हिस्सा मेला क्षेत्र में आता है। मेला क्षेत्र का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा आरक्षित वन क्षेत्र में आता है। 2010 में अदालत ने आरक्षित वन क्षेत्र में गैर वानिकी गतिविधियों पर रोक लगा दी थी। इसके तहत जिला पंचायत मेले के वन क्षेत्र में न दुकान लगा सकता था और नहीं गैर वानिकी गतिविधियां कर सकता था। 2011 से मेले की आर्थिक गतिविधियां जिला पंचायत के स्थान पर नई गठित मेला समिति के पास चली गई। समिति में मेलाधिकारी (एसडीएम), जिला पंचायत के अपर मुख्य अधिकारी और मंदिर समिति के अध्यक्ष शामिल हैं। वहीं, अपर मुख्य अधिकारी राजेश कुमार का कहना है कि मेले के लिए जमीन को लीज पर लिए जाने का भी प्रयास किया जा रहा है।
पिछले साल सिर्फ आठ दिन चला था मेला
पिछले साल मेले पर पड़ी कोरोना की मार पिछले साल कोरोना महामारी के चलते पूर्णागिरि मेला 97 दिन के बजाय सिर्फ आठ दिन चल सका। और इसके बाद अक्तूबर में शारदीय नवरात्र में भी कोरोना से बचाव के निर्देश का पालन कर सीमित रूप से ही तीर्थयात्रियों को आने की इजाजत थी।
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