रामनगर। वरिष्ठ लेखक और विज्ञान कथाकार देवेंद्र मेवाड़ी विगत 50 वर्षों से विज्ञान कथाओं, मार्मिक संस्मरणों से साहित्यिक रचनाधर्मिता से आम जनता के लिए विज्ञान लिख रहे हैं। विज्ञान पर 20 से अधिक पुस्तकें लिख चुके मेवाड़ी सभी पाठकों को किस्सागोई अंदाज में विज्ञान समझा रहे हैं।
नैनीताल जिले के ओखलकांडा क्षेत्र में जन्मे 73 वर्षीय मेवाड़ी वनस्पति विज्ञान में एमएससी, हिंदी में एमए, पत्रकारिता में स्नातकोत्तर हैं। ‘मेरी यादों का पहाड़’ उनका आत्मकथात्मक संस्मरण है। उनके दीर्घकालीन सक्रिय विज्ञान लेखन ने समाज में विज्ञान की जागरूकता फैलाई है।
मेवाड़ी के ही शब्दों में ‘वे साहित्य की कलम से विज्ञान लिखते हैं,’ इससे उनका लिखा विज्ञान सरस होता है। आमजन को किस्से-कहानी की तरह रोचक लगता है। लेखन के इन प्रयोगों को इनकी प्रमुख कृतियों में बखूबी देखा जा सकता है। इनमें ‘विज्ञान और हम’, ‘विज्ञाननामा’, ‘मेरी विज्ञान डायरी’ ‘मेरी प्रिय विज्ञान कथाएं’, ‘फसलें कहें कहानी’, ‘विज्ञान बारहमासा’, ‘विज्ञान जिनका ऋणी है’, ‘सूरज के आंगन में’, ‘सौरमंडल की सैर’ आदि शामिल हैं। मेवाड़ी ने कई विज्ञान पत्रिकाओं, वैज्ञानिक पुस्तकों का संपादन, अनुवाद भी किया है।
इनके स्तरीय विज्ञान लेखन के लिए इन्हें अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है, जिनमें केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा का प्रतिष्ठित आत्माराम पुरस्कार, हिंदी अकादमी दिल्ली का ‘ज्ञान-प्रौद्योगिकी सम्मान’, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार का राष्ट्रीय विज्ञान लोकप्रियकरण पुरस्कार, भारतेंदु राष्ट्रीय बाल साहित्य पुरस्कार आदि शामिल हैं। वह 15,000 से अधिक बच्चों को अपनी किस्सागोई शैली से विज्ञान की दुनिया समझा चुके हैं।
वे दिल्ली में रहकर स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। इसी तर्ज पर रचनात्मक शिक्षक मंडल उत्तराखंड में स्कूली बच्चों में वैज्ञानिक चेतना जगाने, नए सांस्कृतिक मूूल्यों से रूबरू कराने में लगा है। इस संस्था के राज्य संयोजक नवेंदु मठपाल भी देवेंद्र मेवाड़ी के किस्सागोई अंदाज को व्यापक रूप से प्रचारित करने की वकालत करते हैं।