‘बचपन से ही संघर्ष देखा, फर्क बस इतना है कि पहले खुद के लिए संघर्ष किया अब दूसरों के लिए कर रही हूं। ‘नंदी तू राजी खुशी रहिये’ प्रोजेक्ट के जरिए टीबी से पीड़ित लड़कियों का जीवन संवारने का प्रयास कर रही हूं। इसके अलावा महिलाओं पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ भी एक लड़ाई जारी है। इस लड़ाई में मेरे नाम के आगे ‘बहन’ जोड़कर पता नहीं कब मुझे एक ‘उपाधि’ सी दे दी।
नैनीताल में उत्तराखंड प्रशासन अकादमी में आयोजित सेमिनार में भाग लेने पहुंची ‘पर्वतीय उत्थान मंच’ संस्था की सचिव हेमलता बहन कहती हैं कि कुमाऊं में पैदा हुई और गढ़वाल में बचपन बीता, यानी जितनी मैं कुमाऊं की हूं उतनी ही गढ़वाल की। छोटी सी ही उम्र से संघर्ष शुरू हो गया था। उस समय भी रेडियो मेरा बेस्ट फ्रेंड था और आज भी है। भुवनेश्वरी महिला आश्रम ने मुझे संबल दिया। आश्रम में पांच सौ रुपए महीने में नौकरी की। हंसते हुए बताती हैं ‘जब पहली तनख्वाह मिली तो 490 रुपए का रेडियो खरीदा, जो आज भी मेरे पास है।’
संघर्ष की शुरूआत में खुद को कमजोर महसूस करती थी, लेकिन आज हौसला चट्टान सा मजबूत है। इस दौरान मैं महिला उत्पीड़न, जंगल, जमीन से जुड़े मुद्दे और शराब हटाओ अभियान से जुड़ी। दो-तीन साल काम करने के बाद ऋषिकेश आ गई और पर्वतीय जन कल्याण समिति से जुड़ी। उस वक्त देहरादून में महिला हेल्प लाइन की शुरुआत हुई थी। तत्कालीन डीजीपी कंचन चौधरी भट्टाचार्य ने इसके लिए मानव संसाधन की कमी बताई, तो मैने इस काम के लिए हां कर दी। उस सफर पर चली और महिला हिंसा से जुड़े करीब डेढ़ हजार केस साल्व किए। कभी-कभी तो एक-एक दिन में 25 से 30 केस आ जाते थे। काफी चीजों को बदलने का प्रयास किया।
उस दौरान ही मेरे परिवार के ही एक व्यक्ति को कुष्ठ रोग हो गया था और उन्होंने लोगों से तंग आकर हरिद्वार जाकर भीख मांगने का निर्णय लिया। सभी लोग चिंता में आ गए। उन्होंने मुझे इसकी जानकारी दी। मैंने उनका इलाज कराया और आज वे स्वस्थ हैं, लेकिन उस घटना ने जीवन में काफी प्रभाव डाला और तब निर्णय लिया कि डॉट्स प्रोवाइडर के रूप में काम करूंगी। इसकी शुरुआत ऋषिकेश में छह बच्चियों से की, जिन्हें टीबी की बीमारी थी। गरीब परिवार की इन लड़कियों के पास इलाज के लिए भी पैसे नहीं थे, तो मैं उन्हें अपने साथ ले आई और उनके इलाज से लेकर खाने और रहने तक की व्यवस्था की।
टीबी के छह से नौ माह के इलाज में एक लड़की पर करीब साढ़े सात हजार रुपए खर्च होते हैं। ऐसे में पैसा इस प्रोजेक्ट पर बाधा बन रहा था, लेकिन अब कई लोग इस प्रोजेक्ट में साथ हैं। वह लड़कियां स्वस्थ होकर अब घर जा चुकी हैं और फिलहाल दूसरा बैच चल रहा है। हेमलता कहती हैं कि प्रधानमंत्री मोदी कहते हैं कि बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, जबकि मेरा मानना है कि जो जिंदा है उसे बचाओ। अब तो बस यही चाहती हूं कि ‘नंदी तू राजी खुशी रहिये।’