डायनासोर के समय की इस वनस्पति पर वन अनुसंधान केंद्र हल्द्वानी ने शोध किया और अनुसंधान सलाहकार समिति ने शोध को मंजूर किया।
इसके बाद अनुसंधान केंद्र ने लाइकेन को संरक्षित करने और इस पर अन्य शोध करने के लिए मुनस्यारी में देश का पहला लाइकेन गार्डन तैयार किया है। कुछ ही समय में अनुसंधान केंद्र इसे जनता के लिए खोलने की तैयारी कर रहा है, जिससे आम लोगों को भी लाइकेन के बारे में हर तरह की जानकारी मिल सके।
लाइकेन का पर्यावरण की दृष्टि से भी बहुत महत्व है। लाइकेन प्रदूषण को सहन नहीं कर पाते, इसी कारण इनके किसी स्थान पर घटने या बढ़ने के आधार पर प्रदूषण के स्तर को निर्धारित किया जाता है।
लाइकेन में चट्टानों का क्षरण कर खनिजों को अलग करने की क्षमता भी होती है। इनके विघटन से उस स्थान पर खनिज पदार्थों की सतह बन जाती है, जो अन्य पौधों को उगने में सहायता करती है।
भारत के विभिन्न स्थानों में लाइकेन का प्रयोग खाने या दवा बनाने में किया जाता है। हैदराबाद की मशहूर बिरयानी में इसे फ्लेवर के लिए और कन्नौज के इत्र में सुगंध के लिए इस्तेमाल करते हैं।
इसकी रैमालाइना प्रजाति से सनक्रीम और मसाले तैयार होते हैं। पारमेलिका, असनिका प्रजाति से रंग और डाई बनाई जाती है।
लाइकेन डायनासोर काल की वनस्पति है, जो अब तक धरती पर है। पर्यावरण के साथ ही औषधीय रूप से भी इस वनस्पति का बहुत महत्व है। इसके संरक्षण के लिए मुनस्यारी में देश का पहला लाइकेन गार्डन तैयार किया है।
- संजीव चतुर्वेदी, वन संरक्षक अनुसंधान