बाजार को कोसने से कुछ नहीं होगा। वैश्विक बाजार से हमारे स्थानीय बाजार को पंख लगे हैं, इसलिए बाजार का नहीं अनैतिक बाजार का विरोध होना चाहिए।
रविवार को साहित्य अकादमी एवं यूओयू की ‘हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता’ पर आयोजित दो दिनी संगोष्ठी के समापन समारोह में उक्त बात हिंदी के जाने-माने कवि लीलाधर जगूड़ी ने कही। उन्होंने कहा कि महान साहित्य ने अपना पहला पाठ पत्रकारिता से ही सीखा। संगोष्ठी के पहले सत्र की अध्यक्षता करते हुए पत्रकार एवं साहित्यकार पंकज सिंह ने कहा कि साहित्य लिखने वालों को पत्रकार नहीं माना जाता। यह अलगाव चिंता का विषय है।
पत्रकार एवं साहित्यकार राम कुमार कृषक ने समसामयिक साहित्यिक पत्रिकाओं की सीमाओं और संभावनाओं पर चर्चा करते हुए कहा कि इन पत्रिकाओं को प्रकाशित करना साहस और संकल्प की छोटी पूंजी का बड़ा उद्यम है। पत्रकार एवं साहित्यकार श्याम कश्यप का कहना था कि पत्रिकाओं को प्रासंगिक होना चाहिए, जिस पत्रकारिता का अपना व्यक्तित्व होता है वे ही प्रासंगिक बन सकती हैं। उन्होंने समाज में पढ़ने की रुचि घटने पर खेद जताया।
दूसरे सत्र के अध्यक्ष वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार राजकिशोर ने कहा कि साहित्य पत्रकारिता और मीडिया तीन पीढ़ियां हैं, लेकिन जब से खबर देना पेशा बना है तब से ही खबर देने वाला अपने हितों को साधने के लिए इसे इस्तेमाल करने लगा है।
डा. प्रयाग जोशी ने कहा कि रेडियो पर बहुत अच्छे कार्यक्रम आते हैं, लेकिन टेलीविजन और अन्य मीडिया इसे दबाए हुए हैं। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया ने ही सबसे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 10 लाख के सूट का मुद्दा उठाया। डा. चंद्र त्रिखा ने आतंकवाद के दौर में पंजाब की पत्रकारिता का उल्लेख करते हुए पत्रकारों की शहादत को याद किया। इस सत्र को जीवंत बनाया युवा पत्रकार और लाइव इंडिया वेबसाइट की संपादक गीताश्री ने।
उन्होंने मीडिया पर दोष मढ़ने वाले साहित्यकारों को आड़े हाथों लिया और कहा कि मीडिया और साहित्य दो अलग धाराएं हैं। साहित्यकार साहित्यिक शुचितावाद को पकड़े हुए हैं, जबकि जमाना आगे बढ़ गया है और पुराने मूल्यों के नष्ट होने पर ही नए मूल्य आएंगे। समापन समारोह की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. सुभाष धूलिया ने कहा कि साहित्य और पत्रकारिता को बाजार से नहीं बल्कि भोगवाद से खतरा है।
उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं मीडिया अध्ययन विद्या शाखा के निदेशक गोविंद सिंह ने कहा कि संगोष्ठी में कई ऐसे मुद्दे उठे जिन पर आगे पीएचडी या संगोष्ठियां हो सकती हैं। संगोष्ठी में टीवी पत्रकार हृदयेश जोशी, सहायक प्रो. शशांक शुक्ल ने भी अपने विचार रखे। साधना अग्रवाल ने संगोष्ठी का सिंहावलोकन प्रस्तुत किया। साहित्य अकादमी के उप सचिव ब्रजेंद्र त्रिपाठी और प्रो. गोविंद सिंह ने आभार जताया। संगोष्ठी में डा. संतोष मिश्र, डा. सूर्यभान सिंह, डा. देवेश मिश्र, डा. नीरजा सिंह, डा. संगीता वाजपेयी, डा. राजेंद्र कैरा, राजेंद्र क्वीरा, डा. जीवन सिंह मेहता, डा. ताराचंद्र त्रिपाठी आदि थे।