भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी विस्तार में भी कुमाऊं और गढ़वाल का भेदभाव साफ झलका है। पार्टी आलाकमान की नजरों में कुमाऊं में ऐसा नेता ही नहीं है, जिसको कोई जिम्मेदारी सौंपी जा सके। यही वजह रही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कैबिनेट के बाद अब पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की टीम में कुमाऊं से किसी भी नेता को शामिल नहीं किया गया है। कुमाऊं की उपेक्षा को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं होने लगी हैं। जानकारों का कहना है कि पार्टी आलाकमान का यह फैसला भविष्य में प्रदेश की राजनीति भी प्रभावित करेगा।
उत्तराखंड की राजनीतिक में भाजपा और कांग्रेस के लिए कुमाऊं-गढ़वाल और ठाकुर-पंडित हमेशा से बड़ा मुद्दा रहा है। टिकट बंटवारे से लेकर प्रदेश के मुखिया इन्हीं मुद्दों से तय होता आया है। राष्ट्रीय कार्यकारिणी में भी यही मुद्दे हावी रहते हैं। प्रदेश में भाजपा की बात करें तो बड़े नेताओं में तालमेल नहीं है। सभी के अपने गुट हैं। पार्टी आलाकमान भी इसे बखूबी जानता है। लोकसभा चुनाव में टिकट बंटवारे से लेकर मोदी कैबिनेट में जगह पाने की होड़ में माननीयों की गुटबाजी जगजाहिर रह चुकी है। प्रदेश की पांचों लोकसभा सीटें मोदी की झोली में डालने के बाद भी उत्तराखंड से किसी भी सांसद को केबिनेट में प्रतिनिधित्व नहीं मिला।
भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारिणी विस्तार में कुमाऊं पूरी तरह साफ हो गया है। कार्यकारिणी में गढ़वाल से त्रिवेंद्र रावत, हरवंश कपूर, सतपाल महाराज और मदन कौशिक को जगह मिली है। कुमाऊं से किसी भी नेता को कार्यकारिणी में शामिल नहीं किया गया है। कुमाऊं में भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी, पूर्व केंद्रीय मंत्री बची सिंह रावत, नेता प्रतिपक्ष अजय भट्ट, पूर्व केबिनेट मंत्री प्रकाश पंत, हेमंत द्विवेदी और अजय टम्टा जैसे बड़े नाम हैं। इनकी उपेक्षा को लेकर चर्चाएं शुरू हो गई हैं। जानकारों का कहना है कि आगामी विधानसभा चुनाव में असर साफ दिखेगा। विधानसभा चुनाव में टिकट बंटवारे और मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट करने को लेकर कार्यकारिणी में शामिल नेताओं की पूरी तरह पैरवी चलेगी। इसमें कुमाऊं के नेता हाथ मलने के सिवा कुछ नहीं कर पाएंगे।