हम (हिमालय यूनिटी मिशन) की अब तक की गांव बचाओ यात्रा से यह साबित हो रहा है कि गढ़वाल के गांव पलायन, नशा, फसलों का सही दाम न मिलने, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव से जूझ रहे हैं। विकास का एक ऐसा मॉडल है, जिसके केंद्र में गांव है ही नहीं।
यात्रा का अनुभव लोगों की नाराजगी और हताशा के बीच में उपज रहे आक्रोश को अभिव्यक्त कर रहा है। यात्रा की पहली बैठक रविवार को गदरपुर में है। कुमाऊं के गांवों की पड़ताल के साथ 22 अक्तूबर तक हम की यात्री जारी रहेगी।
हम की यात्रा की अब तक की समीक्षा के मुताबिक यात्रा देहरादून जिले के विकासनगर के 138 गांवों के जनसंवाद से 15 सितंबर से शुरू हुई। पहले पड़ाव में ही रिखाड़ गांव के लोगों ने गांव में पानी की किल्लत बताई और कहा कि फसलों का सही दाम नहीं मिलता।
तीन अक्टूबर को चकराता में 47 गांवों के प्रतिनिधियों ने जौनसार में पलायन, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव, बदहाल सिंचाई और परिवहन व्यवस्था का नजारा सामने रखा। चार अक्तूबर को मसूरी में हुई जनसभा में सामने आया कि वन पंचायतें भी बदहाल हैं।
पांच अक्तूूबर को चंबा में हुई सभा में गांव के लोग गांवों पर शहर के विकास का माडल थोपने से गुस्से में नजर आए। मखलोगी गांव में 46 परिवार पलायन कर गए।
उत्तरकाशी में 47 गांवों से आए लोगों ने बताया कि 88 गांवों को संकट में है। चाकौन गांव के विजय पंवार के मुताबिक 40 साल से पुल न बनने से लोग 10 किलोमीटर का चक्कर लगा रहे हैं। आठ अक्तूबर को कर्णप्रयाग पहुंचे गांव बचाओ दल को पता लगा कि डिडोली गांव के चार गांवों को राशन लेने के लिए चार किलोमीटर तक का सफर तय करना होता है।
15 गांवों के केंद्र नौटी के लोग साधारण से इलाज के लिए 25 किलोमीटर दूर जा रहे हैं। दस अक्तूबर को पौड़ी और इसके बाद लैंसडाउन में पलायन और वन अधिनियम का मुद्दा उठा। अब यात्रा कुमाऊं में है। हम का इरादा इस मंडल में भी गांवों की पड़ताल कर इन सब समस्याओं का समाधान गांवों के बीच से ही निकालने का है।