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हर्याव पैलियकि और बदलीं परंपरा 

Sat, 16 Jul 2016 12:02 AM IST
कैलाश पाठक हल्द्वाणी।
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हरेला-1 - फोटो : अमर उजाला
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आजक दिन हर्यावक त्यार भौते खुशी दगाड़ मनाई जाल। ये त्यारौक एक हफ्त पैली बटि इंतजार है रौ। सबै घरों में आजक दिन भौते रौनक रौली। चेलि बेटियां आपुंण सौरास बटि मैत आल। कुमौ में हर्यवाक त्यार योस छ जै में सबैं गौं, घरों में हंसी-खुशी यो त्यार मनाई जांछ। बदली जमानक दगाड़ हर्याव में थ्वाड़ बदलाव देखींछ। फिर लै आपुंणि पछ्यांण, संस्कृति लिजि आज ले सबै लोग सतर्क छन, ये बात कैं देखि, सुणिं बेर भौते भल लागूं। हर्यावक त्यार किलै मनूंनू यो हम सबैं जांणनूं, आजक जमान में जो नई बदलाव ऐ रईं वैक जिकर भौते जरूरी छ कि यो त्यार खेती पाती हैं अलावा और कत्तू चीजक आभास करूंछ और वैक दगाड़ त्यारक कि संबंध छू और नई पीढ़ी में येक बार में कि सोच छ।
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पैलि समय में जां हर्याव हमरि संस्कृति कि पछ्यांण छी वीकै दगाड़ यो ले संदेश दिछि कि समाज में सबैं लोगन में आपसी भाईचारा मजबूत हौ। तब हमार पास आजक समयक जास संसाधन नी छ्या। फिरि लै हर्यावक इतुक ज्यादा महत्व छ्यो कि आपुंण जो परिजन घर नै आ सकन, उनैरि लिजि चिट्ठी में हर्याव भेजी जांछी। आज इंटरनेट, मोबाइल और कंप्यूटरौक समय ऐ गो।

उ चिट्ठीली आज व्हाट्स एप, फेसबुक और ट्विटर जास नई संचार तकनीकक उपयोग लोग करनैईं। सबहैं ठुलि बात यो छ कि परंपरा आज लै बदस्तूर जारी छू। नई पीढ़ी नई समयक हिसाबल त्यार कैं मनूंण लागी रै। ऊ में देश विदेश तक आपणीं संस्कृति पुजूंणैकि नई परंपरा चली रै। जां-जां ले हर्याव मनाई जां, वां-वां बटि संदेश हमन घर बैठि मिलि जैनि। हर्यावक अर्थ मात्र कृषि संपन्नता तक सीमित न्हाती। बल्कि येक संबंध खेती-पातीक दगाड़ संबंधित इलाकैकि जलवायु, माट, फसल चक्र  कई बातनको पत्त लगूंन ले छ। समाज के एक साथ जोड़णक साथै यो त्यार भक्ति, सुख, समृद्धि, धनधान्य, ऐश्वर्यक प्रतीक ले छू। तमाम समाजशास्त्री, बुजुर्ग, ज्योतिष आदि नैलि येकि जो ले व्याख्या करी सबै विषयविद् लोगनक एकै मत य बार में छू। कुल मिलैबेर यो त्यार आपसी भाईचारा और सामंजस्य बनाई राखनैकि एक मजबूत पहल हमार मनीषियोंकि छी। अघिल कै ले ये कैं बदस्तूर जारी रूंन चैंछ।  
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