हद्वाणी। हर्यावक त्यार कूमौ में भौत पैलि बटी मनाई जांछ। यो जै वीलि ले मनाई जांछ वीक बार में आपूं सबै लोगन कैं पत्त छ। हर्यावाक त्यारैकि बात यो छू कि समयाक दगाड़ हर्याव मनूणक तौर तरीक में लेक बदलाव ऐ रौ। फिर लै हमरि परंपरा, संस्कृति, पछ्यांण आजाक हाईटेक जमान में लेक बणीं हुई छू। यो हमर लिजि ठुलि बात छू कि हम आपूंण जड़न कैं नी भुलि रयां और नै कभैं भुलूंल और नै कभै भुलंण चैंन। सबहैं ठुलि बात छू कि हमन कैं आपुंण बुजुर्ग नैकि भली कै जांचि परखि बेर संभाली यो परंपरा में भौत गर्व हुंण चैंछ। हर्यावक अर्थ मात्र कृषि संपन्नता तक सीमित न्हाती बल्कि येक संबंध खेती-पातीक दगाड़ संबंधित इलाकैकि जलवायु, माट, फसल चक्र समेत कई बातनौक पत्त लगूंन लेे छ। ये बातैकि पुष्टि पर्यावरणविद्, समाज विज्ञानी और ज्योतिष ले करनई। हर्याव कैं ली बैर ये सबे विषयविद् नैकि एकै राय छू। कुल मिलाबेर यो त्यार आपसी भाईचारा और सामंजस्य बनाई राखनैकि एक मजबूत पहल हमार मनीषियोंकि छी और ये परंपरा कैं अघिल कै ले जारी रूंन चैं।
हल्द्वानी। हरियाली, खुशहाली, सुख, समृद्धि, ऐश्वर्य का प्रतीक हरेला पर्व घर-घर में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा। हर काली (डिकर) पूजन के साथ ही मंत्रोच्चार के बीच घर के मंदिर में नौ दिन पूर्व बोया गया हरेला आज विधिविधान से काटकर सभी पारिवारिक जनों, पड़ोसियों और ईष्टमित्रों को शिरोधारण कराया जाएगा।
हरेला पर्व के साथ चातुर्मास की शुरुआत होती है। इसी के साथ सावन मास शुरू हो जाता है। हरेला पर्व समूचे कुमाऊं में धूमधाम से मनाया जाता है। पर्व से नौ दिन पूर्व घर में स्थापित मंदिर में पांच या सात प्रकार के अनाज को मिलाकर एक टोकरी में हरेला बोया जाता है। हरेले के तिनके अगर टोकरी में भरभराकर उगें तो माना जाता है कि इस बार फसल अच्छी होगी। हरेला काटने से पूर्व विविध पकवान बनाकर देवी देवताओं को नैवेद्य चढ़ाया जाता है। देवी देवताओं का हरेला से पूजन करने के बाद घर के सभी परिवारीजनों को हरेला शिरोधारण जाता है। इस मौके पर माताओं ने ‘लाग हर्याव, लाग बग्वाल, लाग द्वितीया, जी रये, जागि रये, यो दिन बार भेटने रये’ जैसे आशीर्वचन देकर सभी के मंगलमय और उज्ज्वल भविष्य की कामना की जाती है।
...........
हरेला शिरोधार्य कराते समय देते हैं आशीर्वाद
हरेला शिरोधार्य कराते समय ‘जी रये, जागि रये, धरती जस आगव, आकाश जस चकव है जये, सूरज जस तराण, स्यावै जसि बुद्धि हौ, दूब जस फलिये, सिल पिसि भात खाये, जांठि टेकि झाड़ जाये। अर्थात हमेशा जीवित रहो, जागरूक रहो, पृथ्वी के समान धैर्यवान, आकाश के समान प्रशस्त (उदार) बनो, सूर्य के समान प्रकाशवान, सियार के समान बुद्धिवान, दूर्वा के तृणों के समान पनपो, इतने दीर्घायु हो कि दंतहीन होते हुए भी तुम्हें भात भी पीस कर खाना पड़े और शौच जाने के लिए भी लाठी का उपयोग न करना पड़े।
..................
यह बनते हैं पकवान
हरेला पर्व पर कुमाऊं में विभिन्न तरह के पकवान बनाए जाते हैं। जिनमें प्रमुखत: पूरी, कचौड़ी, पुए, सिंगल, सेई, बड़े, रायता, खीर, आलू के गुटके आदि व्यंजन बनाए जाते हैं।
...............
पहले चिट्ठी में स्वजनों को भेजते थे हरेला
हल्द्वानी। कुमाऊं में हरेले की इतनी समृद्ध परंपरा रही है कि इस त्योहार को मनाने के लिए घर का जो सदस्य मौजूद न हो उसके नाम का हरेला अलग से रखा जाता था। घर से दूर परदेश में नौकरी करने वालों को चिट्ठी में हरेेले के तिनके और देव मंदिर की अशीका (पुष्प) भेजे जाते थे। आज भी कई परिवारों में यह परंपरा मौजूद है।
...............
व्हाट्स एप, फेसबुक ने लिया चिट्ठी का स्थान
हल्द्वानी। समय के बदलते दौर और सूचना क्रांति के इस युग में अब चिट्ठी का स्थान सोशल मीडिया ने ले लिया है। अब लोग किसी भी तीज त्यौहार की शुभकामना, जानकारी, फोटो आदि फेसबुक, व्हाट्स एप, ट्विटर और अन्य सोशल साइटों के माध्यम से परिजनों को भेजने लगे हैं।
..................
हाईटेक हुए पर नहीं छोड़ी परंपरा
जमाने के साथ लोग भी हुए हाईटेक
हाईटेक होते जमाने के साथ लोग भी हाईटेक हो गए हैं। भले ही जमाना हाईटेक हो गया हो लेकिन लोगों ने अभी भी अपनी संस्कृति और परंपराओं को नहीं छोड़ा है। हालांकि इनके तौर तरीके जरूर बदल गए हैं लेकिन परंपराएं आज भी पूरी तरह जीवित हैं और फलफूल रही हैं। घर से बाहर जहां भी लोग बस गए वहीं अपनी सांस्कृतिक परंपराओं का निर्वहन कर रहे हैं। हल्द्वानी जो करीब सौ साल पहले ही आबाद होना शुरू हुआ यहां भी आज लोग अपनी सांस्कृतिक परंपराओं और तीज-त्योहारों को तन्मयता के साथ मना रहे हैं।