हल्द्वानी। शादी-बारातों में धर्मशास्त्रों का महत्व धीरे-धीरे कम होने लगा है। लोग मनमाने ढंग से विवाह कार्य संपन्न करा रहे हैं। दूल्हे के दुल्हन के घर पहुंचते ही उसके जूते छिपाने का शास्त्रों में कोई उल्लेख नहीं है, बावजूद इस परंपरा को आधुनिक तथाकथित संपन्न सभ्यता समझा जाने लगा है।
मौजूदा दौर में बारात के दुल्हन के घर पहुंचने पर दूल्हे का जूता छिपाने की परंपरा चल पड़ी है। जूता छिपाने का काम दुल्हन की बहनें करती हैं और बारात विदा होते समय जूता लौटाने के एवज में हजारों रुपये की डिमांड करती हैं। वर पक्ष को भी अपनी लाज रखने के लिए जूते की कीमत से कई गुना अधिक राशि दुल्हन की बहनों को देनी पड़ती है। ज्योतिषियों के मुताबिक कुमाऊं में दूल्हे का जूता छिपाने की कोई परंपरा नहीं रही है। शास्त्रों में भी जूते छिपाने का कोई उल्लेख नहीं है। धूलिअर्घ के समय दुल्हन का पिता ही वर के पांव धोने से पहले उसके जूते उतारता है। ज्योतिषी डा. गोपाल दत्त त्रिपाठी के मुताबिक धूलिअर्घ्य के दौरान ‘उपानह उपमुंच्युते’ अर्थात् पहले वर के जूते उतारे जाते हैं, का शास्त्राें में उल्लेख है, लेकिन समय बदलने के साथ-साथ इस प्रथा में भी विकृति आ गई है। दूल्हे के जूते कन्या का पिता उतारे, ऐसी नौबत ही नहीं आती है। सालियां रास्ते से ही दूल्हे का जूता उतारकर छिपा लेती हैं। ज्योतिषी इस परंपरा को उचित नहीं मानते हैं।