हल्द्वानी। राज्य में पहली बार संकट ग्रस्त वनस्पतियों की प्रजातियों को बचाने के लिए वन मुख्यालय ने आरक्षण का फार्मूला लागू करने का फैसला किया है। अब जंगल में जो भी पौधरोपण का काम होगा, उसमें दस प्रतिशत दुर्लभ और विलुप्ति की कगार पर पहुंच चुकी वनस्पतियों की प्रजातियों को रोपण होगा। वन मुख्यालय का मानना है कि इस फार्मूले से संकटग्रस्त प्रजातियों को बचाने में मदद मिलेगी साथ ही में जंगल की जैव विविधता में भी बढ़ोतरी होगी।
वन अनुसंधान की शोध सलाहकार समिति की हाल में बैठक हुई। इसमें हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन, मानव निर्मित वजहों से वनस्पतियों पर होने वाले दुष्प्रभाव पर चिंता जताई गई। वन अनुसंधान के वन संरक्षक संजीव चतुर्वेदी ने दुर्लभ और संकट ग्रस्त वनस्पतियों को बचाने और बढ़ाने के लिए एक कार्ययोजना को उच्चाधिकारियों के सामने रखा था। योजना के तहत सूबे की प्रत्येक वन प्रभाग में रोपे जाने वाले कुल पौधों की संख्या में 10 प्रतिशत दुर्लभ, लुप्त प्राय, संकटापन्न प्रजाति के पौधे रोपे जाए। वन अनुसंधान के इस प्रस्ताव को प्रमुख वन संरक्षक जयराज ने मुहर लगा दी है। उन्होंने इस बाबत लिखित आदेश जारी किए हैं।
पहली बार वनस्पतियों को बचाने की नई पहल, प्रत्येक वन प्रभागों को संकटग्रस्त पौधे लगाना जरूरी
93 वनस्पतियां फ्लोरा की खतरे में जबकि 15 फर्न वनस्पतियों पर संकट
ये होंगे फायदे
- प्रदेश में इस साल 167 लाख पौधरोपण का लक्ष्य है, अगर योजना धरातल
पर लागू हुई तो एक बार में ही करीब 16 लाख पौधों का रोपण हो जाएगा
- प्रदेश में 19,570 हेक्टेयर क्षेत्रफल में पौधरोपण का लक्ष्य है। संकटग्रस्त वनस्पतियों का संरक्षण एवं संवर्द्धन होगा
पहाड़ और मैदान में ये वनस्पतियां संकट में
बनवा, फतकी, दूध एटिस, कर्रु, जटामासी, घांट, एल्पाइन बटर वोर्ट, नन का आर्किड, स्नो आर्किड, पटवा, झिगारु
प्रत्येक वन प्रभाग में पौधरोपण का 10 फीसदी दुर्लभ, संकटग्रस्त, विलुप्ति की कगार पर पहुंची वनस्पतियों को रोपना अनिवार्य किया है। इसका सीधा फायदा ऐसी वनस्पतियों को मिलेगा जिनका अस्तित्व खतरे में है।
- संजीव चतुर्वेदी, वन संरक्षक, वन अनुसंधान केंद्र