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वास स् थल पर ही संरक्षित हुआ दर्लभ ऑर्किड

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हल्द्वानी। वन विभाग की मेहनत रंग लाई है। दुर्लभ ऑर्किड को उसके वास स्थल पर ही संरक्षित करने में वन विभाग को सफलता मिली है। विभाग ने पिथौरागढ़ के लुम्ती में ऑर्किड के वास स्थल पर ही संरक्षित किया था। इस समय लुम्ती में ऑर्किड का फूल खिल गया है।
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पिथौरागढ़ के गोरी गंगा घाटी में खूबसूरत ऑर्किड फूल के प्राकृतिक वास स्थल हैं। यह फूल पिथौरागढ़ के मुनस्यारी और जौलजीवी के बीच पाया जाता है। वर्ष 2018 में राज्य स्तरीय सलाहकार समिति ने ऑर्किड पर शोध को मंजूरी दी थी। शोध के दौरान वन अनुसंधान केंद्र को गोरी गंगा घाटी में करीब 125 ऑर्किड की प्रजातियां मिलीं। इनको नर्सरी में उगाने का प्रयास वन विभाग ने किया लेकिन यह प्रयोग ज्यादा सफल नहीं हो सका। ऑर्किड को मानवीय गतिविधियों, जंगलों में चारा काटने वालों, पक्के निर्माण और पेड़ों के कटाने से खतरे को देखते हुए इसको प्राकृतिक वास स्थल पर संरक्षित करने का निर्णय लिया गया। इसके लिए मुनस्यारी और जौलजीवी के लुम्ती वन पंचायत में सवा चार हेक्टेयर में स्थान का चयन किया गया। यहां पर ऑर्किड की 20 प्रजातियों का रोपण किया गया। उसको तार-बाड़ कर सुरक्षित किया गया था।

वास स्थल पर संरक्षित हुआ दुर्लभ ऑर्किड
पिथौरागढ़ में सवा चार हेक्टेयर में किया गया था रोपण


औषधीय गुणों से भरा है ऑर्किड
ऑर्किड सबसे प्राचीनतम औषधियों में से एक माना जाता है। यह फूल देने में सुंदर होने के साथ ही औषधीय गुणों से भरपूर होता है। यह जमीन पर, गिरे हुए पेड़ और खडे़ पेड़ों पर उगता है। ऑर्किड की कई प्रजातियां होती हैं। इनमें से कुछ अप्रैल से ही खिलने लगती हैं। इसके अलावा अधिकतर प्रजातियां बरसात में ही खिलती हैं। इनके खिलने का समय जुलाई और अगस्त होता है।
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पिथौरागढ़ी की लुम्ती वन पंचायत में सवा चार हेक्टेयर में ऑर्किड की नर्सरी तैयार की गई थी। 20 प्रजातियों को वास स्थल पर ही संरक्षित कर लिया गया है। इसके फूल भी खिलने लगे हैं। -संजीव चतुर्वेदी, वन संरक्षक अनुसंधान, उत्तराखंड
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